आजकल ज्यादातर लोग ब्लूटूथ ईयरबड्स का इस्तेमाल करते हैं. घंटों कान में लगाए रखते हैं. लेकिन क्या इनसे ब्रेन कैंसर जैसी बीमारी का खतरा हो सकता है? इस सवाल पर एक्सपर्ट्स ने साफ जवाब दिया है. ब्लूटूथ डिवाइस रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) रेडिएशन के जरिए काम करते हैं.
रेडिएशन शब्द सुनकर कई लोग डर जाते हैं, लेकिन एक्सपर्ट बताते हैं कि ब्लूटूथ से निकलने वाला रेडिएशन 'नॉन-आयोनाइजिंग' प्रकार का होता है. यह एक्स-रे या गामा किरणों जैसे खतरनाक 'आयोनाइजिंग रेडिएशन' से पूरी तरह अलग है. नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन में इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वह शरीर के डीएनए को नुकसान पहुंचा सके.
यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के बायोइंजीनियरिंग प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. केन फोस्टर का कहना है कि ब्लूटूथ डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बहुत कम होता है. उन्होंने बताया कि अगर कोई व्यक्ति घंटों लगातार वायरलेस ईयरबड्स इस्तेमाल करे, तब भी उसका रेडिएशन एक्सपोजर फोन को कान से सटाकर बात करने से काफी कम रहता है.
डॉ. फोस्टर के अनुसार मोबाइल फोन जब कान से लगा होता है तो रेडिएशन सीधे सिर के पास होता है. जबकि ब्लूटूथ ईयरबड्स का पावर लेवल बहुत कम होता है. इसलिए लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर भी ब्रेन पर इसका असर नगण्य माना जाता है. अभी तक किसी वैज्ञानिक रिसर्च में ब्लूटूथ ईयरबड्स और ब्रेन कैंसर के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है.
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर इतना कम रेडिएशन से कैंसर होता तो लाखों लोग प्रभावित हो चुके होते, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है. फिर भी सावधानी बरतना जरूरी है. लंबे समय तक हाई वॉल्यूम पर म्यूजिक सुनने से कान की सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ईयरबड्स का वॉल्यूम 60% से ज्यादा न रखें.
लगातार कई घंटों तक इस्तेमाल न करें
बीच-बीच में ब्रेक लें
रात में सोते समय ईयरबड्स कान से निकाल दें
ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी सुविधाजनक है, लेकिन हर नई टेक्नोलॉजी की तरह इसके इस्तेमाल में संतुलन रखना चाहिए. फिलहाल उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर ब्लूटूथ ईयरबड्स को ब्रेन कैंसर का कारण मानने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. स्वास्थ्य को लेकर कोई भी संदेह हो तो डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.