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Dacoit Movie Review: धुरंधर 2 के तूफान के बीच रिलीज हुई मृणाल ठाकुर की 'डकैत', दिमाग घुमा देगी लव स्टोरी; पढ़ें पूरा रिव्यू

आदिवी शेष और मृणाल ठाकुर की फिल्म 'डकैत' एक ऐसी फिल्म है जिसमें सब कुछ होने के बावजूद कुछ भी खास नहीं बन पाया. कमजोर कहानी और बिखरी पटकथा ने फिल्म को नुकसान पहुंचाया.

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Edited By: Babli Rautela
Dacoit Movie Review: धुरंधर 2 के तूफान के बीच रिलीज हुई मृणाल ठाकुर की 'डकैत', दिमाग घुमा देगी लव स्टोरी; पढ़ें पूरा रिव्यू
Courtesy: Social Media

मुंबई: सिनेमा में जब एक फिल्म बड़े नाम और मजबूत कॉन्सेप्ट के साथ आती है तो दर्शकों की उम्मीदें भी काफी बढ़ जाती हैं. लेकिन कई बार ये उम्मीदें पूरी नहीं हो पातीं. ऐसा ही कुछ देखने को मिला फिल्म डकैत में, जिसमें आदिवी शेष और मृणाल ठाकुर जैसे कलाकार नजर आते हैं. फिल्म की कहानी एक प्रेम और बदले की दास्तान को दिखाती है. इसमें हरि और सरस्वती की कहानी दिखाई गई है जो अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं. प्यार होता है लेकिन एक घटना उनकी जिंदगी बदल देती है. 

हरि पर झूठा आरोप लगता है और उसकी अपनी प्रेमिका उसे जेल भिजवा देती है. सालों बाद जब वह बाहर आता है तो बदले की आग में जल रहा होता है. यही कहानी आगे चलकर एक डकैती ड्रामा में बदल जाती है. 

स्क्रिप्ट और डायरेक्शन ने किया निराश

फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष इसकी पटकथा है. कहानी में कई ऐसे मोड़ आते हैं जो दर्शकों को बांधने के बजाय उलझा देते हैं. टाइमलाइन बार बार बदलती रहती है जिससे कहानी समझना मुश्किल हो जाता है. निर्देशक शेनिल देव एक मजबूत कहानी को प्रभावी तरीके से पेश नहीं कर पाए. फिल्म में वह गहराई और पकड़ नहीं दिखती जो एक अच्छी थ्रिलर में होनी चाहिए. 

डकैत में एक्शन, रोमांस और ड्रामा का मिश्रण है लेकिन कोई भी हिस्सा पूरी तरह प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं होता. खासतौर पर डकैती वाले सीन उतने रोमांचक नहीं लगते जितनी उम्मीद थी.  फिल्म का दूसरा भाग खासतौर पर कमजोर है जहां कहानी पूरी तरह बिखरती नजर आती है. क्लाइमेक्स भी पहले से अंदाजा लगाया जा सकता है जिससे रोमांच खत्म हो जाता है. 

कैसी रही आदिवी-मृणाल की एक्टिंग?

अदिवी शेष ने अपने किरदार में पूरी मेहनत दिखाई है. उन्होंने फिल्म को संभालने की कोशिश की है लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण उनका प्रदर्शन पूरी तरह उभर नहीं पाता.  वहीं Mrunal Thakur को एक मजबूत रोल मिला था लेकिन उनके किरदार को जिस तरह लिखा गया है वह उनकी क्षमता के साथ न्याय नहीं करता.  Anurag Kashyap ने छोटे रोल में भी अपनी छाप छोड़ी है. उनकी मौजूदगी फिल्म के कुछ हिस्सों को बेहतर बनाती है. 

फिल्म के हिंदी डायलॉग्स भी ज्यादा प्रभावी नहीं हैं. कई जगह संवाद असहज और पुराने लगते हैं जिससे दर्शकों का कनेक्शन टूट जाता है. फिल्म का ट्रीटमेंट भी पुराने जमाने जैसा लगता है जबकि आज के दर्शक नई और ताजगी भरी कहानियां पसंद करते हैं.