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RBI का बड़ा फैसला! अब डिफॉल्टर को वापस नहीं मिलेगी उसकी जब्त प्रॉपर्टी

आरबीआई ने बैंकों के लिए वसूली गई अचल संपत्तियों को लेकर नए नियम लागू किए हैं. अब ऐसी संपत्ति डिफॉल्टर या उससे जुड़े पक्षों को नहीं बेची जा सकेगी. साथ ही निपटान और पारदर्शिता के लिए नई समयसीमा भी तय की गई है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
RBI का बड़ा फैसला! अब डिफॉल्टर को वापस नहीं मिलेगी उसकी जब्त प्रॉपर्टी
Courtesy: Pinterest

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों, लघु वित्त बैंकों और एनबीएफसी के लिए वसूली गई अचल संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं. इन नियमों का उद्देश्य रिकवरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और डिफॉल्ट मामलों में संपत्तियों के दुरुपयोग की संभावना को रोकना है. नए मानदंडों के तहत बैंकों की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दी गई हैं.

डिफॉल्टर को दोबारा नहीं बेच सकेंगे संपत्ति

आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बैंक ने कर्ज वसूली की प्रक्रिया के दौरान किसी उधारकर्ता की अचल संपत्ति अपने कब्जे में ली है, तो वह संपत्ति दोबारा उसी डिफॉल्टर या उससे जुड़े किसी संबंधित पक्ष को नहीं बेच सकता. केंद्रीय बैंक का कहना है कि बैंकों का मुख्य उद्देश्य ऋण वितरण होना चाहिए, न कि संपत्तियों का कारोबार करना. केवल असाधारण परिस्थितियों में, जब ऋण गैर-निष्पादित परिसंपत्ति बन जाता है और कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, तभी बैंक सुरक्षा के रूप में रखी गई संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं.

सात साल में निपटान और सार्वजनिक नीलामी पर जोर

आरबीआई ने निर्देश दिया है कि वसूली गई गैर-वित्तीय परिसंपत्तियों का निपटान अधिकतम सात वर्षों के भीतर किया जाना चाहिए. इसके लिए बैंकों को सार्वजनिक नीलामी जैसे पारदर्शी माध्यमों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं. यदि किसी संपत्ति के बदले केवल आंशिक ऋण की भरपाई होती है, तो बची हुई राशि को पुनर्गठित ऋण माना जाएगा और उस पर संबंधित नियामकीय नियम लागू होंगे. इससे रिकवरी प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और जवाबदेह बनने की उम्मीद है.

बोर्ड-अप्रूव नीति और नई रिपोर्टिंग व्यवस्था

केंद्रीय बैंक ने सभी बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और एनबीएफसी को ऐसी संपत्तियों के अधिग्रहण और निपटान के लिए बोर्ड से अनुमोदित नीति तैयार करने का निर्देश दिया है. इसमें पात्रता, वसूली की प्रक्रिया, परिसंपत्तियों की सीमा और समयबद्ध निपटान जैसे प्रावधान शामिल होंगे. साथ ही 30 सितंबर 2026 तक लंबित मामलों को 30 सितंबर 2027 तक नए नियमों के अनुरूप लाना होगा. आरबीआई ने यह भी तय किया है कि ऐसी परिसंपत्तियों को बैलेंस शीट में अलग शीर्षक के तहत दर्शाया जाएगा, जिससे वित्तीय रिपोर्टिंग अधिक पारदर्शी बन सके.