साल 2015 में मकर संक्रांति के दौरान कानपुर में गंगा के घाट पर अंकित अग्रवाल ने देखा कि श्रद्धालु नदियों में पूजा के फूल बहा रहे हैं. पेस्टिसाइड और रंगों से भरे ये फूल नदियों को प्रदूषित कर रहे थे. ऑटोमेशन साइंस पृष्ठभूमि के अंकित ने अपने पर्यावरण इंजीनियर दोस्त प्रतीक कुमार के साथ मिलकर इस समस्या का समाधान निकालने का फैसला किया. शुरुआती असफलताओं के बाद 2017 में उन्होंने 'कानपुर फ्लावरसाइक्लिंग प्राइवेट लिमिटेड' की स्थापना की, जिसे आज दुनिया 'Phool.co' के नाम से जानती है.
संस्थापकों ने शुरुआत में मंदिरों से फेंके गए फूलों को इकट्ठा कर अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाना शुरू किया. उन्होंने इस प्रक्रिया में हाशिए पर मौजूद महिलाओं को रोजगार से जोड़ा. इसके बाद कंपनी ने फूलों के कचरे से चमड़े का विकल्प यानी 'फ्लेदर' (Fleather) नामक बायो-मटेरियल विकसित किया. इस नवाचार ने फैशन जगत का ध्यान आकर्षित किया. जून 2026 में, एनसीएलटी (NCLT) इलाहाबाद पीठ ने 'फ्लेदर' व्यवसाय को मूल कंपनी से अलग कर 'फ्लेदर प्राइवेट लिमिटेड' में डिमर्ज (demerger) करने की मंजूरी दी.
'फूल' को शुरुआत में आईआईटी कानपुर और सोशल अल्फा का समर्थन मिला. इसके बाद अप्रैल 2022 में सिक्स्थ सेंस वेंचर्स के नेतृत्व में सीरीज-ए फंडिंग में कंपनी ने लगभग 8 मिलियन डॉलर (95 करोड़ रुपये) जुटाए, जिसमें अभिनेत्री आलिया भट्ट ने भी निवेश किया. वित्त वर्ष 2025 में कंपनी का परिचालन राजस्व लगभग 77 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और Tracxn के आंकड़ों के अनुसार आज इस स्टार्टअप का मूल्यांकन करीब 200 करोड़ रुपये है.