मिडिल ईस्ट की आग ने कच्चे तेल की कीमतों में किया घी डालने का काम, टूटा 19 महीनों का रिकॉर्ड, भारत के लिए कितना खतरा?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर संघर्ष जल्द थम गया तो कीमतें $70-80 के बीच स्थिर हो सकती हैं. लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा और होर्मुज स्ट्रेट बंद रहा, तो ब्रेंट क्रूड $100 या उससे भी ऊपर जा सकता है. कुछ एनालिस्ट्स ने चरम स्थिति में $120-150 तक के स्तर की बात कही है.

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Antima Pal

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध ने वैश्विक बाजारों में हड़कंप मचा दिया है. ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से उछल रही हैं और हाल ही में यह $82.73 प्रति बैरल के स्तर को छू चुकी है, जो पिछले कई महीनों का उच्चतम स्तर है. बुधवार को भी कीमतें $84 के आसपास पहुंच गईं, जिससे निवेशकों में सप्लाई डिसरप्शन का डर बढ़ गया है. यह तेजी लगातार कई दिनों से जारी है. युद्ध शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड में 20% से अधिक की बढ़ोतरी देखी गई है.

भारत के लिए खतरे की घंटी! 

मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर रोक और क्षेत्रीय एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले हैं. दुनिया का करीब 20% तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है. ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई और अमेरिका-इजराइल के हमलों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. टैंकर ट्रैफिक लगभग ठप हो गया है, जिससे सप्लाई चेन में रुकावट आई है.

मिडिल ईस्ट की आग में झुलसा कच्चा तेल

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर संघर्ष जल्द थम गया तो कीमतें $70-80 के बीच स्थिर हो सकती हैं. लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा और होर्मुज स्ट्रेट बंद रहा, तो ब्रेंट क्रूड $100 या उससे भी ऊपर जा सकता है. कुछ एनालिस्ट्स ने चरम स्थिति में $120-150 तक के स्तर की बात कही है. हालांकि इतिहास बताता है कि ऐसे भू-राजनीतिक संकट में तेज उछाल के बाद कीमतें जल्दी सामान्य हो जाती हैं, बशर्ते कोई बड़ा उत्पादन नुकसान न हो.

भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है. भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85% आयात करता है, जिसमें से 40-45% मध्य पूर्व से आता है. बढ़ती कीमतों से भारत का तेल आयात बिल भारी पड़ सकता है, जो पहले से ही ऊंचा चल रहा है. इससे पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और अन्य ईंधनों के दाम बढ़ने का खतरा है, जो महंगाई को और हवा देगा. घरेलू स्तर पर ट्रांसपोर्ट, खाद्य और अन्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होंगी. 

सरकार के पास रणनीतिक तेल भंडार हैं, लेकिन लंबे समय तक उच्च कीमतें बनी रहने से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा. बाजार अब युद्ध की दिशा पर नजर गड़ाए हुए है. अगर डी-एस्केलेशन होता है या अमेरिका-इजराइल कोई बड़ा कदम उठाते हैं, तो कीमतें नीचे आ सकती हैं. लेकिन फिलहाल अनिश्चितता बनी हुई है. निवेशक सतर्क हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का डर भी बढ़ रहा है. भारत जैसे आयातक देशों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल जुटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है.