देश में 1 जुलाई 2017 को लागू हुई वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी व्यवस्था ने अब अपने दसवें वर्ष में प्रवेश कर लिया है. शुरुआती वर्षों में जहां लक्ष्य पूरे देश के लिए एक समान अप्रत्यक्ष कर प्रणाली स्थापित करना था वहीं अब सरकार का ध्यान इसे अधिक तेज, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने पर है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल निगरानी और डेटा आधारित प्रशासन के जरिए कर प्रणाली को और प्रभावी बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है.
जीएसटी के दस साल पूरे होने के साथ कर प्रशासन में तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है. केंद्र सरकार जीएसटी, आयकर और कस्टम्स के डेटा को आपस में जोड़कर कर संग्रह और निगरानी को मजबूत बना रही है. इसका उद्देश्य करदाताओं के लिए प्रक्रियाओं को आसान बनाना और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप को कम करना है. विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को इससे लाभ मिलने की उम्मीद है, क्योंकि रिफंड प्रक्रिया तेज होगी और अनुपालन संबंधी जटिलताएं घटेंगी. सरकार का मानना है कि डिजिटल व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और कर प्रशासन अधिक प्रभावी बनेगा.
जीएसटी ने देश में लागू 17 केंद्रीय और राज्य करों तथा 13 उपकरों की जगह लेकर एकीकृत अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की नींव रखी थी. इसका उद्देश्य पूरे देश को एक साझा बाजार के रूप में विकसित करना और करों पर कर लगने की समस्या खत्म करना था. बीते नौ वर्षों में पंजीकृत करदाताओं की संख्या 66.5 लाख से बढ़कर लगभग 1.6 करोड़ तक पहुंच गई है. यह वृद्धि अर्थव्यवस्था के औपचारिक क्षेत्र में विस्तार और कर अनुपालन में सुधार का संकेत मानी जा रही है.
जीएसटी के तहत कर ढांचे में समय-समय पर बदलाव किए गए हैं. सितंबर 2025 से लागू नई व्यवस्था में अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं को 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दो प्रमुख श्रेणियों में रखा गया है. वहीं विलासिता और कुछ विशेष उत्पादों पर 40 प्रतिशत की दर बरकरार है. सरकार के अनुसार इस बदलाव से कई वस्तुओं पर कर बोझ कम हुआ है. इसी के साथ मासिक जीएसटी संग्रह भी लगातार बढ़ा है और वित्त वर्ष 2025-26 में औसत मासिक संग्रह लगभग 1.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
हालांकि जीएसटी ने कर प्रणाली को काफी सरल बनाया है, लेकिन कुछ अहम मुद्दे अब भी लंबित हैं. पेट्रोल, डीजल, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एटीएफ अभी भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं. इन उत्पादों को शामिल करने पर राज्यों और केंद्र के बीच अभी सहमति नहीं बन पाई है. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अब अगला कदम कर विवादों को कम करना, प्रक्रियाओं को और सरल बनाना तथा एआई आधारित अनुपालन व्यवस्था को बढ़ावा देना होना चाहिए. उनका कहना है कि इससे करदाताओं को अधिक सहज और भरोसेमंद व्यवस्था मिल सकेगी.