दिल्ली की हवा लंबे समय से स्वास्थ्य के लिए खतरा बनी हुई है. इसी वजह से प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सरकार और अदालतें लगातार सख्त रुख अपना रही हैं. इसका सीधा असर अब वाहनों पर दिखाई दे रहा है.
पुरानी गाड़ियों पर लगे प्रतिबंधों के चलते लाखों वाहन राजधानी की सड़कों से बाहर हो चुके हैं. परिवहन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बीते कुछ सालों में इस प्रक्रिया ने तेज रफ्तार पकड़ी है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021-22 तक केवल 82,340 वाहनों ने दिल्ली से बाहर जाने के लिए एनओसी ली थी. इसके अगले ही साल यह संख्या तेजी से बढ़कर करीब 6.2 लाख तक पहुंच गई. 2024-25 तक कुल एनओसी की संख्या 8.3 लाख के पार चली गई. इनमें से अधिकांश वाहन अपनी वैध आयु पूरी कर चुके थे.
दिल्ली-एनसीआर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के आदेश लागू हैं. इनके तहत 10 साल से पुराने डीजल और 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहनों पर पूरी तरह रोक है. नियम तोड़ने पर कार के लिए 10,000 और दोपहिया वाहन के लिए 5,000 रुपये जुर्माना तय है. सार्वजनिक स्थान पर खड़ी मिलने पर वाहन जब्त भी हो सकता है.
सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेट रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू किया जाता है. GRAP-III में बीएस-III पेट्रोल और बीएस-IV डीजल कारों पर रोक लगती है. GRAP-IV की स्थिति में लगभग सभी डीजल और बीएस-IV पेट्रोल वाहनों पर पाबंदी हो जाती है. इन हालात से बचने के लिए लोग एनओसी लेकर गाड़ियां बाहर भेज रहे हैं.
दिल्ली से बाहर जाने वाली गाड़ियों में से केवल करीब 5 प्रतिशत ही स्क्रैप की जा रही हैं. अधिकांश वाहन दूसरे राज्यों में दोबारा रजिस्ट्रेशन के बाद चलाए जा रहे हैं. 2024-25 तक कुल 1.8 लाख गाड़ियों को ही कबाड़ में बदला गया है, जो अपेक्षाकृत कम है.
सरकार पुरानी गाड़ियां स्क्रैप कराने के लिए प्रोत्साहन दे रही है. अधिकृत सेंटर पर वाहन देने पर नई गाड़ी की खरीद में छूट, रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस में राहत मिलती है. दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में 12 अधिकृत स्क्रैपिंग सेंटर इस सुविधा के लिए बनाए गए हैं.