Garud Puran: हिंदू धर्म में मृत्यु केवल जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा का प्रारंभ मानी जाती है. यह यात्रा कई पड़ावों से होकर गुजरती है, जिनमें से एक सबसे भयावह और रहस्यमयी पड़ाव है — वैतरणी नदी का पार करना. इस नदी का उल्लेख कई पुराणों, विशेषकर गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है, जहां इसे एक कठिन, गहरी और अत्यंत विकराल नदी के रूप में वर्णित किया गया है.
कहा जाता है कि मृत्यु के बाद जब आत्मा यमलोक की ओर अग्रसर होती है, तब उसे वैतरणी नदी पार करनी होती है और यही वह बिंदु है जहां उसकी अब तक के जीवन की सच्ची परीक्षा होती है.
वैतरणी नदी केवल एक भौतिक जलधारा नहीं है, बल्कि यह हमारे कर्मों, पापों और जीवन में किए गए कार्यों का प्रतीक भी है. पुराणों में इसे एक ऐसी नदी बताया गया है, जो रक्त, मांस, कीचड़ और हड्डियों से भरी होती है. पुण्य आत्माएं इसे बिना किसी परेशानी के पार कर जाती हैं, लेकिन जिन लोगों ने जीवन में पाप किए होते हैं, उनके लिए यह नदी नर्क से कम नहीं होती.
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में दान, धर्म, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलता है, उसके लिए वैतरणी नदी पार करना एक सरल कार्य बन जाता है. वहीं जिन्होंने अधर्म, छल, हिंसा और लोभ में जीवन बिताया है, उन्हें यह नदी गहराई और विकरालता से डरा देती है. उनके लिए यह यात्रा इतनी कठिन हो जाती है कि आत्मा तड़पने लगती है और मोक्ष की आशा दूर होती चली जाती है.
वैतरणी पार करने की प्रक्रिया केवल आत्मा की आगे की गति के लिए ही नहीं, बल्कि यह उसके मोक्ष पाने या पुनर्जन्म चक्र में लौटने के निर्णय का भी आधार बनती है. यही कारण है कि जीवित अवस्था में "वैतरणी दान" जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं ताकि मरने के बाद आत्मा को इस नदी को पार करने में बाधा न हो.
वैतरणी नदी केवल मृत्यु के बाद की एक परीक्षा नहीं है, बल्कि यह जीवन के दौरान अर्जित पुण्य और पापों का आईना भी है. यह हमें यह सिखाती है कि मृत्यु के बाद की राह तभी सुगम होती है, जब जीवन धर्म, करुणा और सेवा के मार्ग पर बिताया जाए. जीवन में सद्कर्म ही वैतरणी पार करने की सबसे मजबूत नौका है.