नई दिल्ली: सावन शिवरात्रि का पावन पर्व 11 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा. भगवान शिव को समर्पित इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि सावन शिवरात्रि पर सच्चे मन से महादेव की पूजा करने से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है. हालांकि, शिवलिंग की पूजा करते समय कुछ चीजों का विशेष ध्यान रखना चाहिए.
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने केतकी के फूल को अपनी पूजा में स्वीकार न करने का वरदान दिया था. इसलिए शिवलिंग पर केतकी का फूल अर्पित करने से बचना चाहिए.
भगवान शिव की पूजा में तुलसी के पत्ते चढ़ाना वर्जित माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जालंधर से जुड़ी कथा के कारण महादेव की पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता है.
शिवलिंग पर हल्दी और सिंदूर अर्पित करने की परंपरा नहीं है. पूजा में शिवलिंग पर चंदन, भस्म और अक्षत जैसी पूजन सामग्री अर्पित की जाती है.
भगवान शिव को बेलपत्र बेहद प्रिय माना जाता है. बेलपत्र चढ़ाते समय ध्यान रखें कि पत्तियां साफ और अखंड हों. सामान्य रूप से तीन पत्तियों वाले बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है.
धार्मिक परंपरा में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लिए तांबे के पात्र का इस्तेमाल न करने की सलाह दी जाती है. तांबे के पात्र से जलाभिषेक किया जा सकता है, जबकि दूध के लिए दूसरे पात्र का इस्तेमाल किया जाता है.
शिवलिंग पर शंख से जल अर्पित करना कई धार्मिक परंपराओं में वर्जित माना गया है. इसलिए सावन शिवरात्रि पर जलाभिषेक करते समय शंख के बजाय लोटे या अन्य उपयुक्त पात्र का इस्तेमाल करें.
शिवलिंग की परिक्रमा को लेकर भी विशेष नियम बताए गए हैं. जिस स्थान से अभिषेक का जल बाहर निकलता है, उसे सोमसूत्र या निर्मली कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे लांघने से बचना चाहिए और परिक्रमा करते समय इस स्थान को पार न करने की परंपरा है.
ध्यान रखें कि पूजा के इन नियमों का आधार धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं. अलग अलग क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा विधि में कुछ अंतर हो सकता है. सावन शिवरात्रि पर सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा, स्वच्छता और भक्तिभाव के साथ भगवान शिव की आराधना करना है.