जब वाणी, विद्या और विवेक ने लिया धरती पर अवतार; बसंत पंचमी पर जानिए मां सरस्वती की पावन जन्म कथा
बसंत पंचमी के पावन अवसर पर मां सरस्वती की जन्म कथा का विशेष महत्व माना जाता है. माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला यह पर्व ज्ञान, वाणी और कला की उपासना से जुड़ा है.
हर वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है. यह दिन न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि ज्ञान और सृजन की आराधना का भी प्रतीक है. इसी दिन मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था, जिनकी कृपा से मानव को वाणी, विवेक और बौद्धिक क्षमता प्राप्त हुई.
बसंत पंचमी के दिन उपवास, पीले वस्त्र, पीले पुष्प और मधुर भोग अर्पित करने की परंपरा है. शिक्षार्थी, कलाकार और विद्वान इस दिन विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा करते हैं. मान्यता है कि इस दिन कथा सुनने और नियमपूर्वक व्रत करने से जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलता है और बुद्धि स्थिर होती है.
पौराणिक कथा के बारे में
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सृष्टि की रचना के बाद भगवान ब्रह्मा ने जब संसार का अवलोकन किया, तो चारों ओर मौन और उदासी व्याप्त थी. जीवों में संवाद और भावों की अभिव्यक्ति का अभाव देखकर ब्रह्माजी चिंतित हुए. उन्हें लगा कि सृष्टि में किसी महत्वपूर्ण तत्व की कमी रह गई है.
तब भगवान ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे दिव्य प्रकाश के साथ एक देवी प्रकट हुईं. उनके हाथों में वीणा थी और मुख पर अद्भुत तेज विराजमान था. वे देवी मां सरस्वती थीं. ब्रह्माजी ने उनसे संसार को वाणी प्रदान करने का अनुरोध किया, ताकि जीव एक-दूसरे से संवाद कर सकें.
मां सरस्वती ने अपनी वीणा से मधुर नाद उत्पन्न किया
मां सरस्वती ने अपनी वीणा से मधुर नाद उत्पन्न किया, जिससे संसार में शब्द, भाषा और भावनाओं का संचार हुआ. इसके बाद ही मानव विचार व्यक्त करने और ज्ञान अर्जन करने में सक्षम हुआ. तभी से मां सरस्वती को वाणी, विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माना जाने लगा.
साधक को मिलता है खास फायदा
मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी के दिन इस कथा का श्रवण करने से साधक को विशेष फल प्राप्त होता है. यह व्रत अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देता है. विद्यार्थियों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है, इसलिए शिक्षण संस्थानों में विशेष आयोजन होते हैं.
बसंत पंचमी क्यों मनाया जाता है?
बसंत पंचमी हमें यह संदेश देती है कि सच्चा ज्ञान विनम्रता, विवेक और अनुशासन से आता है. मां सरस्वती की आराधना केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सतत सीखने और संस्कारों को अपनाने का मार्ग दिखाती है. यही कारण है कि यह पर्व आज भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.