चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के साथ ही एक बड़ा सवाल फिर सामने खड़ा हो गया है-क्या राज्य में नीट परीक्षा का भविष्य बदल सकता है? छात्रों को नीट परीक्षा के झंझट से आजादी मिल जाएगी. इस बार चुनावी बहस का केंद्र यही मुद्दा रहा. राजनीतिक दलों ने इसे भावनात्मक और सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय बनाकर पेश किया. अब नतीजे यह तय करेंगे कि नई सरकार इस मुद्दे को कितनी मजबूती से आगे बढ़ाती है और क्या वाकई कोई बदलाव संभव है.
तमिलनाडु में नीट को लेकर विरोध कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार यह चुनावी एजेंडा बन गया. राज्य सरकार और कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह परीक्षा समान अवसर के सिद्धांत को कमजोर करती है. उनका तर्क है कि राष्ट्रीय स्तर का सिलेबस राज्य बोर्ड के छात्रों के लिए असमान स्थिति पैदा करता है, जिससे ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के छात्र पीछे छूट जाते हैं.
आंकड़े भी इस बहस को बल देते हैं. नीट लागू होने से पहले राज्य बोर्ड के छात्रों की मेडिकल सीटों में हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 47 प्रतिशत से नीचे आ गई है. इसके साथ ही कोचिंग पर बढ़ती निर्भरता ने समस्या को और गहरा किया है. महंगी तैयारी गरीब परिवारों के छात्रों के लिए बड़ी बाधा बन रही है.
यह विवाद अब अदालत तक पहुंच चुका है. तमिलनाडु सरकार ने नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें राज्य के एंटी-नीट बिल को मंजूरी नहीं दी गई थी. राज्य का कहना है कि इस तरह के फैसले से संवैधानिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और राज्यों के अधिकार सीमित होते हैं.
फिलहाल सरकार ने कुछ राहत देने के लिए सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण लागू किया है. इसका उद्देश्य ग्रामीण और कमजोर वर्ग के छात्रों को मेडिकल शिक्षा में अवसर देना है. हालांकि, यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं मानी जा रही और व्यापक बदलाव की मांग जारी है.
अब नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाती है. एक ओर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई को तेज करना होगा, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर विशेष छूट हासिल करने की कोशिश करनी होगी. यही तय करेगा कि नीट पर तमिलनाडु की सियासत आगे किस दिशा में जाएगी.