आईआईटी दिल्ली से स्नातक करने वाले 24 वर्षीय चिराग मदान ने कॉर्पोरेट बैंकिंग में सालाना 17 लाख रुपये के पैकेज वाली जॉब को ठुकरा दिया. उन्होंने इस फैसले के पीछे टॉक्सिक वर्क कल्चर, लंबे काम के घंटे और मेंटल हेल्थ का कारण बताया.
सोशल मीडिया पर शेयर किए गए वीडियो में चिराग ने अपने इस फैसले के पीछे का कारण बताया. लोग उनके कारण को सुनकर दंग रह गए और उनके इस फैसले का सम्मान भी कर रहे हैं.
इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए वीडियो में चिराग मदान ने खुलकर अपनी बात रखी. उन्होंने बताया कि उनकी नौकरी 9 से 5 की बजाय 9 से 7 बजे तक की हो गई थी. हफ्ते में छह दिन काम करना पड़ता था और लंच ब्रेक सिर्फ 10-15 मिनट का मिलता था. उन्होंने बताया कि बीमार होने पर सिक लीव नहीं मिलती थी. छुट्टी लेने के लिए विस्तृत स्पष्टीकरण देना पड़ता था. इसके अलावा 10 करोड़ रुपये के डील क्लोज करने जैसे आक्रामक सेल्स टारगेट दिए जाते थे, जो काम के दबाव को और बढ़ा देते थे. चिराग ने इसे 70 घंटे के वर्क वीक के रूप में वर्णित किया और कहा कि इससे उनकी मेंटल हेल्थ बुरी तरह प्रभावित हो रही थी.
चिराग के इस खुलासे ने युवा पेशेवरों के बीच चर्चा छेड़ दी है कि क्या मोटी तनख्वाह के बदले में स्वास्थ्य और खुशी की कीमत चुकानी उचित है. चिराग के वीडियो को देखकर कई यूजर्स ने अपनी समान कहानियां साझा कीं और उनका पूरा समर्थन किया. एक यूजर ने लिखा कि मैं पूरी तरह सहमत हूं. मैंने भी 23 साल की उम्र में बैंक की नौकरी छोड़ दी थी. अब मैं दूसरी कंपनी में बैकएंड रोल पर काम कर रहा हूं. माहौल यहां भी खराब है, लेकिन कम से कम मुझे गलत बिक्री नहीं करनी पड़ती.
चिराग मदान की यह घटना कॉर्पोरेट जगत में बढ़ती टॉक्सिक वर्क कल्चर की ओर इशारा करती है. युवा पीढ़ी अब केवल पैकेज नहीं, बल्कि काम के माहौल, वर्क-लाइफ बैलेंस और मेंटल हेल्थ को भी महत्व देने लगी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कई मामले आने वाले समय में और सामने आ सकते हैं, क्योंकि युवा अपनी खुशी और स्वास्थ्य को सैलरी से ज्यादा अहम मान रहे हैं.