नई दिल्ली: रेलवे ट्रैक को देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि दो पटरियों को जोड़ने वाली जगह पर छोटा सा गैप क्यों छोड़ा जाता है. क्या यह रेलवे की कोई कमी है या इसके पीछे कोई खास वजह है. दरअसल, यह गैप तापमान में होने वाले बदलाव को ध्यान में रखकर रखा जाता है.
रेलवे की पटरियां मुख्य रूप से स्टील से बनी होती हैं. धातुओं की खासियत है कि तापमान बढ़ने पर वे फैलती हैं और तापमान कम होने पर सिकुड़ती हैं. गर्मियों में जब तापमान काफी बढ़ जाता है तो स्टील की रेल पटरियां भी फैलती हैं. वहीं सर्दियों में ठंड के कारण उनका आकार थोड़ा कम हो जाता है.
अगर पटरियों को बिना किसी व्यवस्था के पूरी तरह आपस में जोड़ दिया जाए तो गर्मी में फैलने के लिए उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिलेगी. इससे रेल पर दबाव बढ़ सकता है और पटरी मुड़ने या ऊपर की ओर उठने जैसी स्थिति बन सकती है. ऐसी स्थिति ट्रेन की सुरक्षित आवाजाही के लिए खतरनाक हो सकती है. इसलिए रेल ट्रैक की डिजाइन में तापमान के अनुसार होने वाले फैलाव और सिकुड़न को ध्यान में रखा जाता है.
हालांकि आज के आधुनिक रेलवे ट्रैक में हर जगह ऐसा गैप दिखाई नहीं देता. अब कई स्थानों पर लंबी वेल्डेड रेल और कंटीन्यूअसली वेल्डेड रेल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें रेल के कई हिस्सों को वेल्ड करके लंबा रेल सेक्शन बनाया जाता है. इससे पुराने समय की तरह बार बार जोड़ वाली जगहों पर गैप की जरूरत कम हो गई है.
इसका मतलब यह नहीं है कि तापमान का असर खत्म हो गया. लंबी वेल्डेड रेल में तापमान से बनने वाले दबाव को नियंत्रित करने के लिए विशेष इंजीनियरिंग व्यवस्था की जाती है. जरूरत के अनुसार कुछ स्थानों पर एक्सपैंशन जॉइंट भी लगाए जाते हैं. पुलों और अन्य विशेष ढांचों के पास ऐसे जॉइंट महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
पुराने रेल जॉइंट से ट्रेन गुजरने पर पहियों को हल्का झटका और आवाज महसूस हो सकती थी. आधुनिक वेल्डेड रेल तकनीक ने इस समस्या को काफी कम किया है. इससे ट्रेन की यात्रा अधिक आरामदायक होने के साथ ट्रैक की मजबूती बनाए रखने में भी मदद मिलती है.
इसलिए रेलवे ट्रैक में दिखाई देने वाला छोटा सा गैप कोई गलती नहीं है. यह तापमान के कारण स्टील में होने वाले फैलाव और सिकुड़न को संभालने से जुड़ी इंजीनियरिंग व्यवस्था का हिस्सा है. यानी ट्रैक की यह छोटी सी जगह ट्रेन की सुरक्षित आवाजाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.