देवभूमि उत्तराखंड अपने भीतर समाए सैकड़ों धार्मिक स्थलों की वजह से देशभर में अलग पहचान रखता है. यहां मौजूद चारधाम, यानी केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री, हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं. इन्हीं में से एक यमुनोत्री धाम में हर साल एक खास पल देखने को मिलता है. यमुनोत्री धाम हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है. इस साल भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खास संदेश दिया है. मुख्यमंत्री का यह संदेश उस आस्था को और मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है. आइए जानते हैं इस पवित्र धाम से जुड़ा इतिहास और इसकी खास बातें, जो इसे चारधाम यात्रा की पहली कड़ी बनाती हैं.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से यमुनोत्री धाम पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए एक संदेश साझा किया. मुख्यमंत्री ने लिखा, 'जय मां यमुना..! सभी श्रद्धालुओं का श्री यमुनोत्री धाम में हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन..'. इस छोटे से संदेश के जरिए उन्होंने न सिर्फ भक्तों का अभिवादन किया, बल्कि प्रदेश की धार्मिक धरोहर को भी एक बार फिर सामने रखा.
जय माँ यमुना..! सभी श्रद्धालुओं का श्री यमुनोत्री धाम में हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन.. pic.twitter.com/7dEp9iVBrN
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) June 20, 2026
उत्तराखंड को देवभूमि क्यों कहा जाता है, इसका जवाब यहां मौजूद धार्मिक स्थलों की भरमार में मिलता है. केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री, इन चार पवित्र धामों को मिलाकर ही चारधाम यात्रा कहलाती है. खास बात यह है कि जो भी श्रद्धालु इस यात्रा पर निकलता है, उसकी शुरुआत यमुनोत्री धाम से ही करनी पड़ती है. यही वजह है कि इस धाम को चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार माना जाता है.
यमुनोत्री धाम समुद्र तल से करीब 3225 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थान मां यमुना का निवास स्थल है. ब्रह्मांड पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है, जिसमें बताया गया है कि यमुना नदी की उत्पत्ति यहीं से होती है और फिर यह आगे बढ़ते हुए विस्तार लेती जाती है. यही कारण है कि भक्तों के लिए यह स्थान सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि गहरी आस्था का प्रतीक है.
पौराणिक कथाओं के मुताबिक महाभारत के दौर में पांडवों ने भी अपनी चारधाम यात्रा यमुनोत्री धाम से ही शुरू की थी. इसके बाद उनका सफर गंगोत्री और केदारनाथ से होते हुए बदरीनाथ तक पहुंचा था. माना जाता है कि उसी परंपरा के चलते आज भी श्रद्धालु इस क्रम का पालन करते हुए अपनी यात्रा यमुनोत्री से ही शुरू करते हैं.
मंदिर परिसर में एक विशाल स्तंभ मौजूद है, जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है. श्रद्धालु वाहन के जरिए जानकी चट्टी तक पहुंच सकते हैं, जिसके बाद मंदिर महज पांच किलोमीटर दूर रह जाता है. यह आखिरी हिस्सा श्रद्धालुओं को पैदल ही तय करना होता है. ऋषिकेश से यमुनोत्री की दूरी लगभग 200 किलोमीटर है. मंदिर का निर्माण टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने करवाया था, और हर साल दीपावली के बाद कपाट बंद होकर अक्षय तृतीया पर दोबारा खुलते हैं.