नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड में सावन के आगमन के साथ एक सुंदर लोकपर्व मनाया जाता है – हरेला. इस वर्ष हरेला 16 जुलाई को मनाया जाएगा. यह पर्व केवल खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि हरियाली, कृषि, पर्यावरण और भगवान शिव-पार्वती की पूजा का प्रतीक है.
हरेला शब्द 'हरा' से निकला है, जिसका मतलब है हरा-भरा होना. यह पर्व धरती मां की हरियाली और नई फसल की खुशी मनाता है. कुमाऊं क्षेत्र में यह बड़े उत्साह से मनाया जाता है. लोग मानते हैं कि हरेला अच्छी बारिश, स्वस्थ फसल और परिवार की खुशहाली का संदेश देता है. यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का भी reminder है, क्योंकि इसमें पेड़-पौधों और प्रकृति के प्रति सम्मान दिखाया जाता है.
हरेला बोने की परंपरा बहुत खास है. सावन शुरू होने से करीब 10 दिन पहले घरों में हरेला तैयार किया जाता है. इसके लिए रिंगाल (बांस) की टोकरी ली जाती है. टोकरी में सबसे नीचे तिमिल और मालू के पत्ते बिछाए जाते हैं फिर उस पर अच्छी मिट्टी डाली जाती है.
इस मिट्टी में सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं. इनमें जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट (कोदो या अन्य स्थानीय अनाज) शामिल होते हैं. इन अनाजों को नियमित पानी दिया जाता है ताकि वे अच्छे से अंकुरित हो सकें. लगभग 10-11 दिनों में हरे-भरे पौधे तैयार हो जाते हैं. 16 जुलाई को इन हरे पौधों को तोड़कर पूजा में चढ़ाया जाता है. इसे घर की छत पर या मंदिर में रखा जाता है. लोग मानते हैं कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है.
हरेला भगवान शिव और माता पार्वती से भी जुड़ा हुआ माना जाता है. कुमाऊं की लोक कथाओं के अनुसार यह पर्व शिव-पार्वती के विवाह और प्रकृति के नवीनीकरण का प्रतीक है. हरेला बोना और उसे बढ़ते देखना इष्ट देवता का आशीर्वाद माना जाता है.
इस पर्व के दौरान महिलाएं और बच्चे खास उत्साह से भाग लेते हैं. पूजा के बाद हरेला को नदी या खेत में प्रवाहित कर दिया जाता है, जो पर्यावरण के प्रति सम्मान दर्शाता है.
आज के समय में हरेला पर्व सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि पर्यावरण बचाने का संदेश भी है. यह हमें सिखाता है कि धरती को हरा-भरा रखना कितना जरूरी है. स्कूलों और कॉलेजों में भी अब हरेला प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं ताकि नई पीढ़ी इस संस्कृति से जुड़ सके.