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पहाड़ों में खतरे की घंटी! 98 जलवायु आपदाओं ने बताए उत्तराखंड के 5 बड़े रेड फ्लैग

उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम को लेकर नई रिपोर्ट ने पांच गंभीर खतरे बताए हैं. वर्ष 2025 की 98 प्रमुख जलवायु आपदाओं के विश्लेषण में शासन, बुनियादी ढांचे और पर्यटन से जुड़े जोखिम सामने आए.

Meenu Singh
Edited By: Meenu Singh
पहाड़ों में खतरे की घंटी! 98 जलवायु आपदाओं ने बताए उत्तराखंड के 5 बड़े रेड फ्लैग
Courtesy: Pinterest

उत्तराखंड में बदलता मौसम अब केवल प्राकृतिक चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि विकास और शासन की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है. एसडीसी फाउंडेशन और मेसर्स बिशेन सिंह महेंद्र पाल सिंह की नई बुल में साल 2025 के दौरान सामने आई 98 प्रमुख जलवायु आपदाओं का अध्ययन किया गया है. रिपोर्ट में जनवरी से दिसंबर तक की घटनाओं को देखा गया और हिमालयी राज्य के लिए पांच ऐसे खतरे बताए गए, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

पांच बड़े खतरे सामने आए

‘मेकिंग मोलहिल्स आफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण में आपदाओं के आधार पर पांच प्रमुख रेड फ्लैग बताए गए हैं. इनमें प्रशासनिक देरी, शासन में तालमेल की कमी और जवाबदेही का अभाव शामिल है. इसके अलावा शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में नए आपदा क्षेत्रों का उभरना, ग्लेशियल झीलों तथा हिम क्षेत्र में बदलाव भी चिंता का विषय बताया गया है.

बुनियादी ढांचे पर बढ़ रहा दबाव

अध्ययन में विकास कार्यों से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी आपदा जोखिम बढ़ाने वाला कारक माना गया है. सड़क, निर्माण और अन्य परियोजनाओं के कारण संवेदनशील पहाड़ी इलाकों पर दबाव बढ़ने की बात सामने आई है. इसके साथ ही आवागमन का संकट भी बढ़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, आपदा की स्थिति में कमजोर संपर्क व्यवस्था राहत और बचाव कार्यों को प्रभावित कर सकती है.

पर्यटन से बढ़ रहा पारिस्थितिक दबाव

रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर होने वाले पर्यटन को भी हिमालयी पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती माना गया है. संवेदनशील पहाड़ी भू-दृश्य पर बढ़ती गतिविधियों से प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होने का खतरा है. अध्ययन में यह भी सवाल उठाया गया है कि आपदाओं से निपटने की तैयारियों को लेकर कहीं ऐसा भरोसा तो नहीं बन गया है, जो वास्तविक जोखिम के सामने कमजोर साबित हो सकता है.

कानून, पलायन और समुदायों पर चर्चा

पुस्तक में पर्यावरण से जुड़े कानूनों और विधायी बदलावों के साथ परिसीमन तथा लगातार हो रहे पलायन को भी विश्लेषण में शामिल किया गया है. स्थानीय निवासियों के अनुभवों के जरिए बदलते सामाजिक और पर्यावरणीय हालात को समझने की कोशिश की गई है. जलवायु संकट के दौर में संविधान और समुदायों के अधिकारों के संबंध को भी पुस्तक में महत्वपूर्ण विषय बनाया गया है.

दून में हुआ पुस्तक का लोकार्पण

पुस्तक का शनिवार को दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में लोकार्पण किया गया. कार्यक्रम की थीम ‘कम्युनिटीज एंड कान्स्टिट्यूशनल राइट्स इन द टाइम्स आफ क्लाइमेट क्राइसिस’ रही. अनूप नौटियाल ने कहा कि उत्तराखंड के विकास विमर्श में जलवायु परिवर्तन, समुदायों और संवैधानिक चिंताओं को प्रमुखता देनी होगी. डॉ. मनीष मेहता, डॉ. लोकेश ओहरी और गौतम कुमार ने भी संबंधित मुद्दों पर अपने विचार रखे.