बागेश्वर: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कांडा तहसील के पास पहाड़ों की गोद में और घने जंगलों के बीच स्थित भद्रकाली मंदिर एक प्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठ है. प्राकृतिक सुंदरता और गहरी धार्मिक आस्था का यह अनुपम संगम श्रद्धालुओं को खूब आकर्षित करता है.
स्थानीय लोग इसे 'छोटी वैष्णो देवी' के नाम से भी पुकारते हैं. साल भर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन रक्षाबंधन के मौके पर भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ती है. मंदिर के पुजारी नंद बल्लभ जोशी के अनुसार इस पवित्र स्थान का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है.
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम का मुंडन संस्कार यहीं हुआ था. यही वजह है कि मंदिर को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है. दूर-दूर से लोग यहां मां भद्रकाली के दर्शन करने आते हैं.
भद्रकाली मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां देवी की पूजा तीन अलग-अलग स्वरूपों में की जाती है. भक्त मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली के रूप में उनकी आराधना करते हैं. लोग शिक्षा की कामना लेकर सरस्वती रूप, धन-समृद्धि के लिए लक्ष्मी रूप और शक्ति एवं सुरक्षा के लिए काली रूप की पूजा करते हैं.
मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से मां के दरबार में आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं. मंदिर के पास एक झरना भी है, जिसे भक्त मां काली की जीभ मानते हैं. यह जगह धार्मिक और प्राकृतिक दोनों दृष्टि से बेहद खूबसूरत है. घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित यह मंदिर शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है.
रक्षाबंधन के दिन इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुरक्षा की कामना लेकर मां भद्रकाली से प्रार्थना करती हैं. रक्षाबंधन पर मंदिर में भक्तों की भीड़ देखते ही बनती है. पुजारी जी बताते हैं कि इस दिन विशेष रूप से पूजा करने से भक्तों को अधिक आशीर्वाद मिलता है.
भद्रकाली मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है बल्कि पर्यटकों को भी अपनी ओर खींचता है. पहाड़ी रास्ते, हरे-भरे जंगल और शांत वातावरण यहां आने वाले हर व्यक्ति को मोहित कर लेता है. स्थानीय प्रशासन और पुजारी मंदिर की साफ-सफाई और सुविधाओं पर लगातार ध्यान देते रहते हैं ताकि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के दर्शन कर सकें.