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बदरी-केदार की धरती पर आज भी गूंजती है पांडवों की अमर गाथा, गढ़वाल का नृत्य बना आस्था और संस्कृति की पहचान

गढ़वाल का पांडव नृत्य महाभारत से जुड़ी प्राचीन लोक परंपरा है. नवंबर और दिसंबर में आयोजित होने वाला यह अनुष्ठान आस्था, संस्कृति, लोककला और सामाजिक एकता का अनूठा संगम माना जाता है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
बदरी-केदार की धरती पर आज भी गूंजती है पांडवों की अमर गाथा, गढ़वाल का नृत्य बना आस्था और संस्कृति की पहचान
Courtesy: Pinterest

गढ़वाल: उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत में पांडव नृत्य का विशेष स्थान है. यह केवल एक लोकनृत्य नहीं बल्कि महाभारत काल से जुड़ी आस्था, इतिहास और लोक परंपरा का जीवंत स्वरूप माना जाता है. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी गांवों में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.

लोक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध से पहले और युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों ने गढ़वाल क्षेत्र में लंबा समय बिताया था. माना जाता है कि लाखामंडल में दुर्योधन ने माता कुंती और पांडवों को जिंदा जलाने के लिए लाक्षागृह बनवाया था. 

किसके निर्देश पर पहुंचे केदारभूमि?

युद्ध के बाद महर्षि वेदव्यास के निर्देश पर पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद लेने केदारभूमि पहुंचे. उन्होंने केदारनाथ सहित मध्यमेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर में भगवान शिव की आराधना की. इसके बाद बदरीशपुरी होते हुए स्वर्गारोहिणी की यात्रा पर निकले.

इन्हीं मान्यताओं के कारण गढ़वाल में पांडवों को लोक देवता का दर्जा प्राप्त है. हर वर्ष नवंबर और दिसंबर के दौरान विशेष रूप से रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर क्षेत्र में पांडव नृत्य का भव्य आयोजन होता है. इस दौरान गांवों में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है और प्रवासी लोग भी अपने घर लौट आते हैं. विवाहित बेटियां भी मायके पहुंचकर इस सांस्कृतिक आयोजन में भाग लेती हैं.

कहां किया जाता है आयोजित? 

पांडव नृत्य गांव के पांडव चौक में आयोजित किया जाता है. ढोल और दमाऊ की विशेष ताल के साथ यह अनुष्ठान शुरू होता है. मान्यता है कि विशेष लय बजते ही पांडवों के पश्वा यानी उनके प्रतिनिधि माने जाने वाले पात्रों पर दिव्य शक्ति का अवतरण होता है. युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी सहित कुल 13 पात्र इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं.

कौन करता है आयोजित?

यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है. इसमें नृत्य, संगीत, लोकगीत और नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से महाभारत की घटनाओं, पांडवों के संघर्ष, कृषि, युद्ध कौशल, हास्य और सामाजिक जीवन का जीवंत चित्रण किया जाता है. इस पूरे आयोजन का संचालन गांव का ढोली करता है, जो अपनी लोक स्मृति और ज्ञान के आधार पर कथा को गीत और संवादों में प्रस्तुत करता है. इसकी कोई लिखित पटकथा नहीं होती.

पांडव नृत्य को गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और सामाजिक एकता का प्रतीक भी माना जाता है. यह परंपरा आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है और नई पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है.