रक्षाबंधन पर यहां कभी दी जाती थी नरबलि, 28 अगस्त को फिर आमने सामने होंगी सेनाएं; जानें अनोखी युद्ध की परंपरा

चंपावत के देवीधुरा में रक्षाबंधन के दिन बग्वाल युद्ध की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, पहले यहां नरबलि दी जाती थी, जिसे बाद में बग्वाल की परंपरा से बदल दिया गया.

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Km Jaya

चंपावत: उत्तराखंड के चंपावत जिले के देवीधुरा में रक्षाबंधन के दिन सदियों पुरानी बग्वाल युद्ध की अनोखी परंपरा निभाई जाती है. मां वाराही देवी को समर्पित यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था का केंद्र है. इस बार ऐतिहासिक बग्वाल 28 अगस्त को खोलीखाड दुर्वाचौड मैदान में खेली जाएगी. इसके लिए चार खामों और सात थोकों के रणबांकुरे तैयारियों में जुट गए हैं.

देवीधुरा में 13 दिवसीय बग्वाल मेले की शुरुआत 23 अगस्त से हो चुकी है. मेला चार सितंबर को पुरस्कार वितरण के साथ संपन्न होगा. मेले के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति और पारंपरिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. बग्वाल के दिन हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुंचने की उम्मीद रहती है.

कभी होती थी नरबलि की परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, कई सदियों पहले मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए देवीधुरा में नरबलि की परंपरा थी. कथा के अनुसार, जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि देने की बारी आई तो उसने मां वाराही की तपस्या की. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने मानव बलि के स्थान पर ऐसा उपाय स्वीकार किया, जिसमें एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहने के बाद पूजा संपन्न मानी जाए.


इसके बाद चारों खामों के बीच बग्वाल की परंपरा शुरू होने की मान्यता है. बग्वाल में चार खाम चम्याल, गहडवाल, वालिक और लमगडिया के लोग शामिल होते हैं.

पहले पत्थरों से होता था युद्ध

पहले बग्वाल के दौरान चारों खामों के लोग एक दूसरे पर पत्थरों की बौछार करते थे. जब पर्याप्त रक्त बहने का संकेत मिलता था तो मंदिर के पुजारी मैदान में पहुंचकर बग्वाल रोक देते थे. इसके बाद सभी लोग एक दूसरे के गले मिलकर कुशलक्षेम पूछते थे.

हालांकि वर्ष 2013 के बाद अदालत के निर्देशों के चलते बग्वाल के स्वरूप में बदलाव किया गया. अब पत्थरों के स्थान पर फल और फूलों का इस्तेमाल किया जाता है. इससे परंपरा भी कायम है और गंभीर चोटों का खतरा भी कम हुआ है.

चार खामों के बीच होती है बग्वाल

बग्वाल में चम्याल और गहडवाल खाम मैदान के पूर्वी हिस्से से हिस्सा लेते हैं, जबकि वालिक और लमगडिया खाम पश्चिमी हिस्से से मैदान में उतरते हैं. चारों खाम के लोग अपनी अलग पहचान वाले साफे पहनते हैं. गहडवाल खाम केसरिया, चम्याल गुलाबी, वालिक सफेद और लमगडिया पीले साफे पहनते हैं.

रणबांकुरे रिंगाल से बनी ढाल और पारंपरिक साधनों के साथ मैदान में पहुंचते हैं. खुद को बचाते हुए सामने वाले दल की ओर से फेंके गए फल और फूलों को वापस दूसरी ओर फेंकना ही बग्वाल का प्रमुख स्वरूप है.

सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक

देवीधुरा की बग्वाल केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक मानी जाती है. अलग अलग समुदायों और जातियों से जुड़े लोग चारों खामों के माध्यम से इस आयोजन में एक साथ भाग लेते हैं. बग्वाल के बाद सभी एक दूसरे से मिलते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं.

बग्वाल को आषाढी कौतिक के नाम से भी जाना जाता है. इसे देखने के लिए हर वर्ष देश के अलग अलग हिस्सों से श्रद्धालु और पर्यटक देवीधुरा पहुंचते हैं. 28 अगस्त को होने वाली बग्वाल के लिए क्षेत्र में तैयारियां तेज हो गई हैं और ऐतिहासिक मैदान एक बार फिर इस अनोखी सांस्कृतिक परंपरा का गवाह बनने जा रहा है.