उत्तराखंड की धरती पर मां नंदा देवी के प्रति लोगों की आस्था सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं है. उन्हें यहां बेटी के रूप में भी देखा जाता है. यही वजह है कि मां नंदा से जुड़ी परंपराओं में श्रद्धा के साथ भावनाओं का गहरा रिश्ता दिखाई देता है. अब 12 साल बाद एक बार फिर बड़ी जात का अवसर आया है. शनिवार को चमोली के कुरुड़ स्थित नंदा धाम से यह धार्मिक यात्रा कैलाश के लिए रवाना होगी. करीब 296 किमी लंबी यात्रा में कई पड़ाव आएंगे. इस यात्रा में धियाणियों के साथ बड़ी संख्या में प्रवासी भी अपने गांव लौटे हैं.
मान्यता के अनुसार मां नंदा देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी माना जाता है. उत्तराखंड में उन्हें आराध्या और हिमालय की संरक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है. मां नंदा को आनंद देने वाली देवी भी माना जाता है. उनकी आस्था कुमाऊं और गढ़वाल की संस्कृति से गहराई से जुड़ी है.
बड़ी जात में चौसिंग्या खाडू यानी चार सींग वाला मेढ़ा विशेष भूमिका निभाएगा. इसी के नेतृत्व में यात्रा आगे बढ़ेगी. करीब 296 किमी की इस पैदल यात्रा में पांच निर्जन और 21 आबादी वाले पड़ाव होंगे. 20 सितंबर को होमकुंड में चौसिंग्या खाडू को मां नंदा के साथ कैलास के लिए विदा किया जाएगा.
बड़ी जात में शामिल होने के लिए धियाणियां यानी ब्याहता बेटियां अपने गांव पहुंची हैं. उनके साथ बड़ी संख्या में प्रवासी भी गांव लौटे हैं. मान्यता है कि मां नंदा हर 12 साल में अपने मायके नौटी आती हैं. इसी भाव के साथ यह यात्रा मायके से ससुराल कैलास की ओर उनकी विदाई का प्रतीक मानी जाती है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को नंदा अष्टमी के रूप में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. इस दिन केले के पेड़ यानी कदली से मां नंदा की मूर्तियां बनाकर पूजा की जाती है. मां नंदा देवी की महिमा का उल्लेख मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी किया है. उन्होंने अल्मोड़ा के मां नंदा देवी मंदिर का वीडियो साझा कर इसे श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बताया है.