Nainital Landslide Threat: नैनीताल अपनी झील और खूबसूरत पहाड़ियों के लिए देश-दुनिया में मशहूर है लेकिन इसकी जमीन का बदलता स्वरूप चिंता बढ़ा रहा है. नई रिसर्च में पहाड़ियों के बड़े हिस्से में भूस्खलन का खतरा सामने आया है. ऐसे में 1880 की वह घटना फिर याद आ रही है, जिसमें 151 लोगों की जान गई थी.
शोधकर्ताओं और भू-विज्ञानियों के अध्ययन में नैनीताल की पहाड़ियों के 24.9 प्रतिशत हिस्से को बेहद ज्यादा भूस्खलन जोखिम वाला पाया गया है. वहीं 59.6 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम में है. 2017 से 2024 तक यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-1A उपग्रह से मिले आंकड़ों का PSI तकनीक से अध्ययन किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक बलियानाला में जमीन हर साल करीब 8 से 10 मिलीमीटर नीचे जा रही है. वहीं शेर-का-डांडा में 6 से 8 मिलीमीटर सालाना ऊपर उठने के संकेत मिले हैं। इससे पहाड़ी इलाकों में जमीन की गतिविधि को लेकर चिंता बढ़ी है.
18 सितंबर 1880 को लगातार दो दिन की बारिश के बाद मल्लीताल में बड़ा भूस्खलन हुआ था. कई इमारतें मलबे में दबकर ढह गईं और नैना देवी मंदिर को भी नुकसान पहुंचा. इस हादसे में 151 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 108 भारतीय और 43 ब्रिटिश नागरिक थे. नैनीताल में इससे पहले 1867 में चार्टन लॉज की पहाड़ी पर भूस्खलन हुआ था. इसके बाद संवेदनशील इलाकों की निगरानी के लिए हिल साइड सेफ्टी कमेटी बनाई गई थी.
नैनीताल में भूस्खलन की घटनाएं लंबे समय से होती रही हैं. 1866 में आल्मा की पहाड़ी और 1867 में नैनीताल क्लब क्षेत्र में जमीन खिसकने की घटनाएं दर्ज हुईं. 1888 में नैना पीक और चायना पीक पर चट्टानें दरकीं. वहीं 1924 में अयारपाटा क्षेत्र प्रभावित हुआ. 1987 और 1988 में भी चायना पीक पर भूस्खलन हुआ. 21 जून 1988 को सीआरएसटी के ऊपर भी घटना हुई थी. पुराने रिकॉर्ड और नई रिसर्च मिलकर नैनीताल की पहाड़ियों की संवेदनशीलता को सामने रखते हैं.