देहरादून: उत्तराखंड में टाइप-1 डायबिटीज बच्चों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है. प्रदेश में चार हजार से अधिक बच्चे इस बीमारी से जूझ रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम की स्क्रीनिंग रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 40 हजार से अधिक बच्चे डायबिटीज से प्रभावित हैं.
इनमें चार हजार से ज्यादा बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हैं. बीमारी के बढ़ते मामलों को देखते हुए बच्चों की जांच, उपचार और नियमित निगरानी पर जोर दिया जा रहा है.
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भी टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया है. उन्होंने टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चियों के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाया. इस दौरान उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों को जीवनभर इंसुलिन की जरूरत होती है. उन्होंने टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों को आजीवन मुफ्त इंसुलिन उपलब्ध कराने की पहल का भी उल्लेख किया और बीमारी की समय पर पहचान को महत्वपूर्ण बताया.
उत्तराखंड में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों की पहचान और निगरानी के लिए शुरू किया गया गुब्बारा क्लीनिक अब प्रदेश के सभी 13 जिलों तक पहुंच चुका है. इन क्लीनिकों के जरिए बच्चों की जांच, ब्लड शुगर की निगरानी, चिकित्सकीय परामर्श और नियमित फालोअप की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है.
देहरादून जिला अस्पताल में शुरू किए गए गुब्बारा क्लीनिक में भी बच्चों को मुफ्त जांच और नियमित निगरानी की सुविधा मिल रही है. इसका उद्देश्य बीमारी की पहचान जल्द करना और बच्चों को समय पर जरूरी उपचार उपलब्ध कराना है.
स्वास्थ्य विभाग के सामने अब टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों का जिला-वार एकीकृत डाटा तैयार करने की चुनौती है. केंद्रीकृत डाटा बनने से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस जिले में कितने बच्चे बीमारी से प्रभावित हैं, कितने बच्चों को नियमित इंसुलिन की जरूरत है और कितने बच्चे लगातार फालोअप में हैं.
इस डाटा के आधार पर इंसुलिन, ग्लूकोमीटर और टेस्ट स्ट्रिप्स जैसी जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत का बेहतर आकलन किया जा सकेगा. इससे संसाधनों की उपलब्धता और बच्चों की नियमित निगरानी को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में टाइप-1 डायबिटीज की समय पर पहचान बड़ी चुनौती है. बच्चों में बार-बार प्यास लगना, तेजी से वजन घटना, अत्यधिक थकान और बार-बार पेशाब आने जैसे लक्षणों को कई बार सामान्य कमजोरी समझ लिया जाता है. इससे बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है.
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइन में शुरुआती लक्षणों की पहचान के लिए 4टी मॉडल पर जोर दिया गया है. इसमें टॉयलेट, थर्स्ट, टायर्डनेस और थिननेस शामिल हैं. बच्चों में इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना जरूरी है, ताकि समय पर जांच और उपचार शुरू किया जा सके.