उत्तराखंड में 26 साल का सूखा खत्म करने की तैयारी में बीजेपी, इन 4 अभेद्य सीटों पर फतह का बनाया प्लान
उत्तराखंड में भाजपा ने उन चार विधानसभा सीटों पर विशेष रणनीति लागू की है, जहां पार्टी कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी. संगठन ने वरिष्ठ नेताओं की तैनाती कर चुनावी तैयारियां और बूथ स्तर का प्रबंधन तेज कर दिया है.
देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी रही हैं, जहां भाजपा लंबे समय से जीत का इंतजार कर रही है. राज्य गठन के बाद हुए चुनावों में कई बार सत्ता में आने के बावजूद पार्टी चकराता, पिरान कलियर, मंगलौर और धारचूला जैसी सीटों पर सफलता हासिल नहीं कर पाई. अब आगामी चुनावी तैयारियों को देखते हुए संगठन ने इन क्षेत्रों पर विशेष फोकस शुरू कर दिया है. वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपने के साथ-साथ बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाई जा रही है.
भाजपा ने उन चार सीटों को प्राथमिकता दी है, जहां पार्टी अब तक जीत का परचम नहीं लहरा सकी. संगठन का मानना है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति को मजबूत करने के लिए इन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन जरूरी है. इसी उद्देश्य से चुनावी तैयारियों को पहले ही गति दे दी गई है.
कोर कमेटी के नेताओं को जिम्मेदारी
पार्टी ने प्रत्येक महत्वपूर्ण सीट पर प्रदेश कोर कमेटी के एक-एक वरिष्ठ सदस्य को तैनात किया है. इन नेताओं को चुनाव तक पूरे क्षेत्र की गतिविधियों और संगठनात्मक प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है. पार्टी मुख्यालय भी इन क्षेत्रों की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है.
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बूथ स्तर तक पहुंचने की तैयारी
माइक्रो मैनेजमेंट के तहत बूथ, मंडल, मोर्चा, प्रकोष्ठ और विभिन्न संगठनात्मक इकाइयों को एक मंच पर लाया गया है. उद्देश्य यह है कि हर मतदाता तक पार्टी की पहुंच सुनिश्चित हो सके. कार्यकर्ताओं को क्षेत्रवार जिम्मेदारियां देकर संपर्क अभियान को मजबूत किया जा रहा है.
इन सीटों पर रहा विपक्ष का दबदबा
चकराता सीट पर वर्ष 2002 से 2022 तक कांग्रेस के प्रीतम सिंह लगातार जीतते रहे हैं. पिरान कलियर में कांग्रेस के फुरकान अहमद का प्रभाव बना हुआ है. मंगलौर सीट पर बसपा और कांग्रेस का वर्चस्व रहा, जबकि धारचूला में निर्दलीय और कांग्रेस उम्मीदवारों ने लगातार सफलता हासिल की है.
त्रिकोणीय मुकाबले पर भी नजर
भाजपा केवल अपने संगठन को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी समीकरणों का भी अध्ययन कर रही है. पार्टी की नजर उन संभावित उम्मीदवारों पर भी है, जो मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं. संगठन का मानना है कि स्थानीय परिस्थितियों और मजबूत चुनावी प्रबंधन के जरिए इन कठिन सीटों पर नई संभावनाएं बनाई जा सकती हैं.