उत्तराखंड: उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है. सबसे बड़ा बदलाव मतदाता सूची में होने वाला है. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत राज्य की वोटर लिस्ट से करीब 8.41 लाख नाम हटाए जा सकते हैं. यह संख्या कुल मतदाताओं का लगभग 10.56 प्रतिशत है. इतने बड़े बदलाव से कई सीटों का समीकरण बिगड़ सकता है.
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार पूरे राज्य में 79.60 लाख मतदाता हैं. इनमें से 71.16 लाख के फॉर्म डिजिटल हो चुके हैं. बाकी 8.41 लाख मतदाता 'अनकलेक्टेबल' श्रेणी में रखे गए हैं. इनमें मृतक, दूसरे राज्यों या जगहों पर बस गए, पहले से कहीं और वोटर लिस्ट में नाम जुड़े और लंबे समय से गांव-शहर से गायब लोग शामिल हैं.
2022 के चुनाव में कई सीटों पर जीत-हार का फैसला 1000 वोटों से भी कम अंतर से हुआ था. ऐसे में 8 लाख से ज्यादा वोटरों के हटने का असर सीधे चुनाव नतीजों पर पड़ेगा. खासकर उन सीटों पर जहां मुकाबला कांटे का था, वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को नई रणनीति बनानी पड़ेगी.
पहाड़ी इलाकों से लगातार पलायन हो रहा है. नौकरी और बेहतर जीवन की तलाश में युवा मैदानी इलाकों और दूसरे राज्यों की ओर जा रहे हैं. नतीजतन, कई पहाड़ी विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग स्थिर या बहुत कम बढ़ी है. वहीं मैदानी क्षेत्रों में तेजी से वृद्धि हो रही है. धर्मपुर, रुद्रपुर, काशीपुर, कालाढूंगी और सहसपुर जैसी सीटों पर पिछले दस साल में मतदाताओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ी है. यहां बाहरी राज्यों से आने वाले लोगों की बसावट भी बढ़ रही है.
इस डेमोग्राफिक बदलाव से स्थानीय वोट बैंक पर असर पड़ रहा है. पहाड़ी सीटों में वोटर कम होने और मैदानी इलाकों में नए वोटर बढ़ने से पार्टियों की वोट की गणित पूरी तरह बदल सकती है.
मतदाता सूची का पुनरीक्षण अब सिर्फ नाम हटाने-जोड़ने तक सीमित नहीं रह गया है. यह 2027 के पूरे चुनावी माहौल को प्रभावित करेगा. राजनीतिक दल अब बूथ स्तर पर सक्रिय हो गए हैं. वे अपने समर्थकों के नाम बचाने और नए वोटर बनाने की कोशिश में जुटे हैं. विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि यह प्रक्रिया कुछ खास वर्गों को निशाना बनाकर की जा रही है.