लखनऊ: लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना के बाद फायर सेफ्टी और फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है. अक्सर जब किसी इमारत, कोचिंग सेंटर, अस्पताल, होटल या व्यावसायिक भवन में आग लगती है तो जांच में यह सामने आता है कि वहां फायर एनओसी नहीं थी या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फायर एनओसी लेना कितना कठिन है और बिल्डिंग मालिक इससे बचने की कोशिश क्यों करते हैं.
फायर एनओसी एक ऐसा प्रमाण पत्र है जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भवन में आग से बचाव और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम मौजूद हैं. सामान्य रूप से 15 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले भवनों और विशेष श्रेणी की इमारतों जैसे अस्पताल, होटल, स्कूल, कॉलेज और व्यावसायिक परिसरों के लिए फायर एनओसी अनिवार्य होती है. हालांकि भवन के उपयोग और श्रेणी के अनुसार ऊंचाई की सीमा अलग-अलग हो सकती है.
फायर एनओसी राज्य के अग्निशमन विभाग द्वारा जारी की जाती है. कई राज्यों में इसकी ऑनलाइन आवेदन व्यवस्था भी उपलब्ध है. इसकी फीस भवन की ऊंचाई, क्षेत्रफल और उपयोग के आधार पर तय होती है और आमतौर पर 2 हजार रुपये से लेकर 50 हजार रुपये या उससे अधिक तक हो सकती है.
फायर एनओसी प्राप्त करने के लिए भवन में कई सुरक्षा मानकों का पालन करना जरूरी होता है. इनमें पर्याप्त चौड़ाई वाली सड़क, फायर ब्रिगेड की पहुंच, इमरजेंसी एग्जिट, अग्निरोधी दरवाजे, स्मोक मैनेजमेंट सिस्टम, फायर अलार्म, फायर डिटेक्शन सिस्टम, स्प्रिंकलर, फायर पंप, अग्निशमन यंत्र, पब्लिक एड्रेस सिस्टम और बैकअप बिजली व्यवस्था शामिल हैं.
इसके अलावा भवन में सीढ़ियों की संख्या, उनकी चौड़ाई, कॉरिडोर की चौड़ाई, लिफ्ट की व्यवस्था, फायर कंट्रोल रूम, धुआं निकालने की व्यवस्था और फायर रेसिस्टेंट दीवारों जैसी सुविधाओं की भी जांच की जाती है. आवेदन के दौरान भवन मालिक को दर्जनों तकनीकी सवालों के जवाब देने पड़ते हैं और संबंधित दस्तावेज जमा करने होते हैं.