राज्यानुदानित मदरसों की जमीन से छत तक जांच की मांग, NHRC ने लिया संज्ञान; 4 सप्ताह में रिपोर्ट तलब
उत्तर प्रदेश के राज्यानुदानित मदरसों की जमीन, भवन, भवन मानचित्र, फायर सेफ्टी और संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर उठे सवाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंच गए हैं.
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के राज्यानुदानित मदरसों की व्यवस्था को लेकर उठ रहे गंभीर सवाल अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC तक पहुंच गए हैं. मामला केवल मदरसों की मान्यता और सरकारी अनुदान तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि अब इन संस्थानों की जमीन, भवन, निर्माण की वैधता, भवन मानचित्र, फायर सेफ्टी और बच्चों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी जांच के दायरे में आ गए हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता इंजीनियर मो. तलहा अंसारी की शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की बेंच ने मामले का संज्ञान लिया है. श्री प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली आयोग की बेंच ने शिकायत में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया मानवाधिकार उल्लंघन का मामला माना है. आयोग ने उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग के निदेशक को आरोपों की जांच कराने और चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है.
शिकायतकर्ता की क्या है मांग?
शिकायत में प्रदेश के शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्रों में संचालित राज्यानुदानित मदरसों की भूमि और भवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं. इनमें भूमि की वैधता, भवन मानचित्र, भूमि उपयोग, अग्नि सुरक्षा और भवन की संरचनात्मक सुरक्षा प्रमुख हैं. शिकायतकर्ता की मांग है कि केवल कागजों में संस्था की मान्यता और अनुदान की स्थिति देखने के बजाय मौके पर जाकर जमीन और भवन की वास्तविक स्थिति की जांच की जाए.
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क्या जमीन मदरसे के नाम वैध रूप से दर्ज है?
राज्यानुदानित मदरसों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जाती है. ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिन भवनों में बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उनके निर्माण के लिए इस्तेमाल की गई जमीन का कानूनी दर्जा क्या है. क्या जमीन मदरसे के नाम वैध रूप से दर्ज है. क्या राजस्व रिकॉर्ड में जमीन की श्रेणी वही है जो मौके पर दिखाई दे रही है. क्या उस जमीन का इस्तेमाल शैक्षणिक संस्था के लिए कानून के अनुसार किया जा सकता है. क्या भवन के निर्माण के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी.
और किन-किन चीजों की होगी जांच?
जांच में यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि कहीं किसी मदरसे का भवन सरकारी, नगर निकाय, नजूल या किसी अन्य सार्वजनिक श्रेणी की जमीन पर तो नहीं बना है. यदि किसी संस्थान की जमीन से जुड़े दस्तावेज और मौके की स्थिति अलग-अलग पाए जाते हैं, तो उसके लिए जिम्मेदारी भी तय करनी होगी.
किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए केवल मान्यता होना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता. जमीन और भवन की वैधता भी महत्वपूर्ण है. यदि किसी भवन का निर्माण ऐसी जमीन पर हुआ है जिस पर संस्था का वैध अधिकार नहीं है, तो सरकारी सहायता दिए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ सकता है.
सरकारी जमीन पर भवन मिला तो उठेंगे कई सवाल
शिकायत में यह आशंका भी जताई गई है कि यदि किसी राज्यानुदानित मदरसे का भवन सरकारी अथवा नगर निकाय की जमीन पर बिना वैध अधिकार या अनुमति के बना हुआ पाया जाता है, तो मामला केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं रहेगा. ऐसी स्थिति में यह भी जांच का विषय होगा कि उस भवन को सरकारी सहायता किस आधार पर मिलती रही.
यह सवाल भी उठेगा कि भवन की मान्यता और सत्यापन किस अधिकारी ने किया था. स्थलीय निरीक्षण के दौरान जमीन की वास्तविक स्थिति क्यों नहीं सामने आई. नगर निकाय और राजस्व अभिलेखों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया. यदि जमीन से जुड़ी कोई कमी पहले से मौजूद थी तो उसे जांच के दौरान क्यों नहीं पकड़ा गया.
भवन का नक्शा पास है या सिर्फ फाइलों में स्वीकृत
मामले में दूसरा महत्वपूर्ण सवाल भवन मानचित्र को लेकर है. शहरी क्षेत्रों में किसी भी भवन के निर्माण से पहले संबंधित नियमों के अनुसार भवन मानचित्र की स्वीकृति आवश्यक होती है. ऐसे में जांच के दौरान यह देखा जाना जरूरी होगा कि राज्यानुदानित मदरसों के पास स्वीकृत भवन मानचित्र उपलब्ध है या नहीं.
यदि नक्शा स्वीकृत है तो मौके पर बने भवन का उससे मिलान भी किया जाना चाहिए. यह देखना होगा कि भवन का वास्तविक क्षेत्रफल स्वीकृत क्षेत्रफल के अनुरूप है या नहीं. कितनी मंजिलों की अनुमति दी गई थी और मौके पर कितनी मंजिलें बनी हैं. कहीं स्वीकृति के बाद अतिरिक्त निर्माण तो नहीं किया गया. भवन का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए हो रहा है या नहीं जिसके लिए अनुमति मिली थी.
फायर सेफ्टी बनी सबसे संवेदनशील चिंता
मामले का सबसे गंभीर पहलू बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा है. मदरसों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं. ऐसे में किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था होना जरूरी है.
जांच में यह देखना होगा कि संबंधित भवनों में फायर सेफ्टी की व्यवस्था मौजूद है या नहीं. क्या आवश्यक अग्निशमन उपकरण उपलब्ध हैं. क्या आपातकालीन निकास की व्यवस्था है. क्या फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र मौजूद है. यदि प्रमाणपत्र जारी हुआ है तो वह किस सक्षम प्राधिकारी ने जारी किया और उसकी वैधता कितने समय तक थी.
भवन की सुरक्षा केवल फायर सेफ्टी तक सीमित नहीं है. यह भी देखना होगा कि भवन structurally सुरक्षित है या नहीं. इसके लिए Structural Stability और Building Safety से संबंधित आवश्यक प्रमाणपत्रों की जांच जरूरी हो सकती है.
यदि किसी भवन की संरचनात्मक स्थिरता का परीक्षण हुआ है तो उसके प्रमाणपत्र की जांच की जानी चाहिए. यह भी देखना होगा कि प्रमाणपत्र किस सक्षम संस्था या अधिकारी ने जारी किया. कब जारी किया गया और क्या वह अभी भी वैध है. इसी तरह विद्युत सुरक्षा और अन्य आवश्यक सुरक्षा मानकों की स्थिति भी जांच का हिस्सा बन सकती है.
558 राज्यानुदानित मदरसों की राज्यव्यापी जांच की मांग
शिकायतकर्ता की ओर से केवल एक मदरसे की जांच की मांग नहीं की गई है. इसके बजाय राज्यानुदानित मदरसों की राज्यव्यापी सुरक्षा और कानूनी अनुपालन ऑडिट की मांग उठाई गई है. यदि व्यापक जांच होती है तो प्रदेश के 558 राज्यानुदानित मदरसों में जमीन और भवन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है.
भूमि की जांच में वास्तविक स्वामित्व, राजस्व अभिलेखों में जमीन की श्रेणी, सरकारी या नगर निकाय की जमीन की स्थिति, भूमि उपयोग की वैधता, कब्जे और दस्तावेजों की स्थिति तथा जमीन के क्षेत्रफल का मौके से मिलान किया जा सकता है.
सरकारी अनुदान देने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में
यदि किसी मदरसे की जमीन या भवन में गंभीर अनियमितता पाई जाती है तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि उसे सरकारी अनुदान कैसे मिलता रहा. इसके लिए अनुदान जारी करने से पहले किए गए सत्यापन की जांच करनी होगी.
यदि किसी रिकॉर्ड में गंभीर कमी होने के बावजूद अनुदान जारी किया गया तो संबंधित प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका की जांच भी आवश्यक हो सकती है.
अब अधिकारियों की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण
इस पूरे मामले में अधिकारियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक हो सकती है. यदि जांच में किसी संस्था के भूमि या भवन संबंधी दस्तावेजों में गंभीर कमी मिलती है और इसके बावजूद सरकारी अनुदान जारी होता रहा, तो केवल संस्था को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा.
यह पता लगाना जरूरी होगा कि संबंधित संस्था का निरीक्षण किस अधिकारी ने किया. यदि जांच में रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में गंभीर अंतर सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का सवाल भी उठ सकता है.
NHRC ने चार सप्ताह में रिपोर्ट मांगी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले में उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग के निदेशक को शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कराने का निर्देश दिया है. आयोग ने चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है.
अब विभाग की रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण होगी. रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकता है कि शिकायत में उठाए गए भूमि, भवन, नक्शा, फायर सेफ्टी, संरचनात्मक सुरक्षा और सरकारी अनुदान से जुड़े आरोपों की जांच किस स्तर तक की गई.
कागजों के बजाय मौके की जांच पर रहेगा जोर
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जांच केवल कार्यालयी रिकॉर्ड तक सीमित रहती है या वास्तविक स्थलीय निरीक्षण भी किया जाता है. जमीन के मामले में राजस्व रिकॉर्ड का मौके से मिलान जरूरी होगा. भवन के मामले में स्वीकृत नक्शे और वास्तविक निर्माण की तुलना करनी होगी. फायर सेफ्टी के मामले में मौके पर उपलब्ध व्यवस्था देखनी होगी.
क्योंकि कागजों में जमीन की स्थिति और मौके की स्थिति अलग हो सकती है. फाइल में भवन का नक्शा स्वीकृत हो सकता है, लेकिन मौके पर निर्माण उससे अलग हो सकता है. इसी तरह फायर सेफ्टी से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद वास्तविक व्यवस्था अधूरी हो सकती है.
अब निगाह चार सप्ताह बाद आने वाली रिपोर्ट पर
NHRC के संज्ञान के बाद अब संबंधित विभाग को शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कर रिपोर्ट देनी होगी. चार सप्ताह में आने वाली रिपोर्ट यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और कितनी शिकायतें रिकॉर्ड तथा स्थलीय जांच में सही पाई जाती हैं.