बांके बिहारी मंदिर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, परंपराओं में दखल पर लगाई रोक

यूपी के वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त और स्पष्ट रुख अपनाते हुए मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का निर्देश दिया है.

Pinterest
Shilpa Srivastava

वृंदावन: यूपी के वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त और स्पष्ट रुख अपनाते हुए मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का निर्देश दिया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि मंदिर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और व्यवस्थाओं में फिलहाल किसी भी प्रकार का ढांचागत बदलाव नहीं किया जाएगा. इस फैसले से मंदिर के सेवायतों और श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से परंपराओं में हस्तक्षेप को लेकर चिंतित थे.

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद मंदिर की प्रबंधन व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं में बदलाव को लेकर सामने आया है. श्री बांके बिहारी मंदिर की प्रबंध समिति और सेवायतों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि अदालत द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अपनी सीमाओं से आगे बढ़ते हुए ऐसे फैसले लिए हैं, जो मंदिर की परंपराओं में हस्तक्षेप करते हैं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये फैसले न केवल धार्मिक रीति-रिवाजों को प्रभावित करते हैं, बल्कि मंदिर की मूल संरचना और परंपरागत व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि अदालत फिलहाल किसी भी प्रकार के ढांचागत बदलाव के पक्ष में नहीं है. कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक सभी पक्षों की दलीलें पूरी तरह से नहीं सुनी जातीं, तब तक यथास्थिति बनाए रखना ही उचित होगा. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद तय की है, ताकि सभी पक्ष हाल ही में दाखिल स्थिति रिपोर्ट पर अपना जवाब प्रस्तुत कर सकें.

किन मुद्दों पर जताई गई आपत्ति?

सेवायतों की ओर से जिन प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है, उनमें दर्शन के समय में बदलाव, देहरी पूजा की परंपरा को बंद करना और फूल बंगला सेवा के लिए अत्यधिक शुल्क निर्धारित करना शामिल है. उनका कहना है कि ये निर्णय मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था के खिलाफ हैं और इससे श्रद्धालुओं की आस्था भी प्रभावित हो सकती है. सेवायतों का यह भी आरोप है कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अपनी शक्तियों की व्याख्या जरूरत से ज्यादा व्यापक तरीके से की है.

वकीलों ने मांगा समय

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि उन्हें स्थिति रिपोर्ट देर से प्राप्त हुई है, जिसके चलते वे तुरंत जवाब दाखिल नहीं कर सके. उन्होंने इस पर विस्तृत जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया. अब अगली सुनवाई में इस रिपोर्ट पर विस्तार से बहस होने की संभावना है.

सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही कार्य कर रही है और वह किसी भी स्थिति में अदालत के आदेशों का उल्लंघन नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि समिति का उद्देश्य मंदिर की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना है, न कि परंपराओं में हस्तक्षेप करना.

पहले भी हो चुका है हस्तक्षेप

गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा चुका है. इसके साथ ही मंदिर के कामकाज की निगरानी के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंपी गई थी.

आगे क्या?

अब इस मामले की अगली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. सभी पक्षों के जवाब और दलीलों के आधार पर अदालत आगे की दिशा तय करेगी. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ संकेत दे दिया है कि धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों में कोई भी बड़ा बदलाव सोच-समझकर और सभी पक्षों की सहमति से ही किया जाएगा.