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17 साल के छात्र के एक व्लॉग से कैसे बैकफुट पर आ गई CBSE? ऑन-स्क्रीन मार्किंग पर छिड़ा घमासान

झारखंड के एक छात्र द्वारा उजागर किए गए टेंडर दस्तावेजों ने सीबीएसई के 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' सिस्टम को एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल दिया है. नियमों में बदलाव कर एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाने के संगीन आरोप लगे हैं.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) प्रणाली इन दिनों देश के सियासी और शैक्षिक हलकों में भारी चर्चा का विषय बनी हुई है. बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में आई गिरावट और उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग में हुई कथित गड़बड़ियों के बाद इस डिजिटल व्यवस्था पर लगातार उंगलियां उठ रही थीं. इसी बीच झारखंड के एक स्कूली छात्र के खोजी ब्लॉग ने इस पूरे मामले को एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है, जिससे बोर्ड बैकफुट पर आ गया है.

रांची के रहने वाले सत्रह वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत ने खुद को इस नई मूल्यांकन व्यवस्था से प्रभावित लाखों बच्चों में से एक बताया है. नतीजों से नाखुश होने के बाद जब उन्हें अपने नंबरों पर संदेह हुआ, तो उन्होंने हार मानने के बजाय सरकारी खरीद पोर्टल पर मौजूद टेंडर के जटिल दस्तावेजों की बारीकी से जांच शुरू कर दी. सार्थक ने कई दिनों की कड़ी मेहनत के बाद अपने निष्कर्षों को इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिया.

टेंडर शर्तों में भारी हेरफेर का दावा

सार्थक ने अपने ब्लॉग 'हाउ सीबीएसई रीरोट रूल्स टू फेवर कोएम्प्ट एडुटेक' में आरोप लगाया है कि बोर्ड ने तीन लगातार टेंडर राउंड में अपनी ही नियमावली को जानबूझकर बदला. उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया के जरिए हैदराबाद की कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' की राह आसान की गई. टेंडर में पहले से मौजूद 'पूर्व में ब्लैकलिस्टेड' होने की कड़ी शर्त को बदलकर सिर्फ 'वर्तमान में ब्लैकलिस्टेड' कर दिया गया, जो कई गंभीर सवाल खड़े करता है.

दिग्गज आईटी कंपनियों को पछाड़ने का खेल

छात्र के दावों के अनुसार, इस पूरे सौदे में सॉफ्टवेयर परिपक्वता के वैश्विक पैमाने यानी 'सीएमएमआई' सर्टिफिकेशन की अनिवार्यता को भी लेवल 5 से घटाकर सिर्फ लेवल 3 कर दिया गया. इसके अलावा, उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग के लिए तय न्यूनतम रिज़ॉल्यूशन को भी 300 डीपीआई से कम करके 200 डीपीआई कर दिया गया. इन नरमी भरे बदलावों के कारण उद्योग जगत की दिग्गज कंपनी टीसीएस इस रेस में पिछड़ गई.

राजनीतिक दलों ने सरकार को घेरा

इस खुलासे के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कई अन्य विपक्षी नेताओं ने छात्र के इस प्रयास की सराहना की है. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर इस रिपोर्ट को साझा करते हुए शिक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए हैं और पूरे मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने की मांग की है. विपक्ष का सीधा आरोप है कि बोर्ड ने चंद अधिकारियों के फायदे के लिए लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया है.

बोर्ड और कंपनी का आधिकारिक पक्ष

दूसरी तरफ, सीबीएसई प्रशासन और कोएम्प्ट एडुटेक दोनों ने ही किसी भी तरह की धांधली या गलत काम से साफ इनकार किया है. बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि टेंडर की शर्तों में किए गए बदलाव पिछली कमियों को दूर करने और प्रक्रिया को बेहतर बनाने का हिस्सा थे. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ने भी स्पष्ट किया है कि वे पूरी तरह वैध हैं और पुरानी कानूनी अड़चनों से अदालत द्वारा मुक्त किए जा चुके हैं.