इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि दुष्कर्म की घटना से जन्म लेने वाला बच्चा किसी भी तरह से दोषी नहीं होता और उसे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का पूरा अधिकार है. कोर्ट ने इस मामले में केवल पीड़िता की स्थिति पर ही नहीं, बल्कि ऐसे बच्चों के भविष्य, अधिकारों और सामाजिक स्वीकृति पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की. साथ ही सरकार को कानूनी सुधारों पर विचार करने की सलाह दी.
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि किसी बच्चे का मूल्य उसके जन्म की परिस्थितियों से तय नहीं किया जा सकता. अदालत के अनुसार, दुष्कर्म जैसी दर्दनाक घटना का शिकार बच्चा नहीं होता, बल्कि वह भी परिस्थितियों का एक हिस्सा बन जाता है. इसलिए उसे किसी प्रकार के सामाजिक कलंक से जोड़ना उचित नहीं है. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सम्मान, समानता और संवैधानिक संरक्षण का अधिकार हर बच्चे को प्राप्त है. किसी भी बच्चे को उसके जन्म की पृष्ठभूमि के आधार पर कमतर नहीं आंका जा सकता. अदालत की यह टिप्पणी मानव गरिमा और बाल अधिकारों के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इतिहास का उल्लेख करते हुए चंद्रगुप्त मौर्य का उदाहरण दिया. पीठ ने कहा कि इतिहास में कई ऐसी महान हस्तियां हुई हैं जिनका जन्म कठिन और असामान्य परिस्थितियों में हुआ, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा और कर्म से नई पहचान बनाई. अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कार्यों और व्यक्तित्व से होना चाहिए. इसी संदर्भ में न्यायालय ने यह भी कहा कि समाज को ऐसे बच्चों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है ताकि उन्हें भेदभाव या उपेक्षा का सामना न करना पड़े.
यह मामला मेरठ की एक नाबालिग पीड़िता से जुड़ा है, जिसने गर्भपात की इच्छा व्यक्त की थी. अदालत के सामने यह तथ्य आया कि संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण समय पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी. परिणामस्वरूप काफी समय बीत गया और गर्भपात कराना संभव नहीं रहा. न्यायालय ने इस स्थिति को गंभीर प्रशासनिक विफलता बताया. अदालत ने कहा कि कानून में उपलब्ध प्रावधानों के बावजूद यदि पीड़िता को समय पर सहायता नहीं मिलती, तो यह व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है. साथ ही सभी जिलों में आवश्यक मेडिकल बोर्डों के गठन को लेकर भी निर्देश दिए गए.
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी महसूस किया कि दुष्कर्म के कारण जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को लेकर देश में कोई विशेष कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है. इसी वजह से न्यायालय ने सरकार को ऐसा कानून बनाने पर विचार करने की सलाह दी, जिसमें इन बच्चों को विशेष संरक्षण और सहायता मिल सके. अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल और पुनर्वास जैसी सुविधाओं का अधिकार सुनिश्चित किया जाए. इसके अलावा गोद लेने और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधान भी स्पष्ट किए जाएं. कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश देते हुए कहा कि जब तक कोई नई व्यवस्था नहीं बनती, तब तक संबंधित संस्थाएं ऐसे बच्चों के हितों की निगरानी करेंगी.