300 साल पुरानी हाथों से लिखी रामचरितमानस मिली, अयोध्या के रामकथा संग्रहालय में रखी जाएगी ये अनमोल धरोहर
अयोध्या में 300 साल पुरानी हस्तलिखित रामचरितमानस की पांडुलिपि मिली है, जिसे रामकथा संग्रहालय में संरक्षित किया जाएगा. इसकी प्रामाणिकता की जांच जारी है.
अयोध्या: भगवान राम की नगरी अयोध्या से एक गर्व भरी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है. यहां के अंतर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय को आखिरकार एक दुर्लभ विरासत कलाकृति मिल गई है. जिसकी खोज लंबे समय से की जा रही थी. 'पांडुलिपि संरक्षण यज्ञ' अभियान के तहत, रामचरितमानस की लगभग 300 साल पुरानी हाथ से लिखी पांडुलिपि जो भगवान राम के प्रति भक्ति का एक शानदार प्रतीक है. अब सामने आई है.
अमेठी के कुमारगंज इलाके में रहने वाले जगजीत सिंह ने इस अनमोल पांडुलिपि को सालों तक बहुत सावधानी से सहेजकर रखा था. उन्होंने इसे संग्रहालय में सुरक्षित रखने के लिए एक औपचारिक अनुरोध किया है.
क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बताया जा रहा है कि यह पांडुलिपि देवनागरी लिपि में हाथ से लिखी गई है और अपनी प्राचीनता के कारण इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस पांडुलिपि के मामले को गंभीरता से लेते हुए, संग्रहालय प्रशासन ने इसकी प्रामाणिकता और ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
संग्रहालय के निदेशक ने क्या बताया?
संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव कुमार सिंह के अनुसार पांडुलिपि को विस्तृत जांच और अध्ययन पूरा होने के बाद ही आधिकारिक तौर पर संग्रहालय के संग्रह में शामिल किया जाएगा. रामकथा संग्रहालय को नृपेंद्र मिश्रा जो नई दिल्ली में प्रधानमंत्री संग्रहालय के अध्यक्ष और राम मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं, उनके मार्गदर्शन में एक 'भंडार केंद्र' के रूप में नामित किया गया है.
इस पहल के हिस्से के रूप में पूरे देश से प्राचीन और हाथ से लिखी पांडुलिपियों को एकत्र करने के लिए वर्तमान में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है.
क्या है इसकी खासियत?
विशेषज्ञों के अनुसार यह पांडुलिपि न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि भाषाई और ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. उम्मीद है कि यह प्राचीन देवनागरी लिपि की संरचना, अक्षरों के निर्माण और उस युग में प्रचलित लेखन शैली के बारे में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करेगी.
उस काल की लेखन शैली आधुनिक देवनागरी से काफी भिन्न थी. यह अंतर इस ऐतिहासिक धरोहर को और भी अधिक अद्वितीय और विशेष बनाता है. 'राम की नगरी' में प्राप्त यह दुर्लभ पांडुलिपि न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण भी है. यदि इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है, तो यह खोज इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो जाएगी.