बिजनौर के नजीबाबाद क्षेत्र के रहने वाले अल्ताफ की बीमारी ने पूरे परिवार को मुश्किल हालात में डाल दिया है. बेटे की जिंदगी बचाने के लिए उनकी मां शेरूनिका ने अपनी किडनी दान कर दी. परिवार के मुताबिक, मोहाली के एक निजी अस्पताल में अक्टूबर 2025 में करीब 7 लाख रुपये की लागत से किडनी ट्रांसप्लांट हुआ. हालांकि कुछ समय बाद अल्ताफ की हालत दोबारा बिगड़ने लगी.
परिवार का दावा है कि प्रत्यारोपित किडनी ने काम करना बंद कर दिया. हालत खराब होने पर जुलाई 2026 में अल्ताफ को चंडीगढ़ के PGI ले जाया गया. वह करीब आठ दिन अस्पताल में भर्ती रहा. बाद में उसे डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन डायलिसिस की जरूरत बनी रही. परिवार के अनुसार अब लगभग हर तीसरे दिन डायलिसिस करानी पड़ती है.
परिवार PGI में कम लागत वाली डायलिसिस की कोशिश करता है, जहां करीब 500 रुपये में यह सुविधा मिलने की बात बताई गई है. हालांकि नंबर नहीं आने पर उन्हें निजी सेंटर जाना पड़ता है. वहां एक डायलिसिस पर करीब 3,000 रुपये खर्च हो जाते हैं. लगातार इलाज की जरूरत ने परिवार की आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव डाला है.
अल्ताफ के परिवार के मुताबिक ट्रांसप्लांट और इसके बाद के इलाज पर करीब 9.5 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. इलाज का खर्च जुटाने के लिए परिवार को अपनी करीब एक बीघा जमीन भी बेचनी पड़ी. अब नियमित डायलिसिस के खर्च की व्यवस्था करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
बीमारी से पहले अल्ताफ करीब पांच साल तक अबू धाबी में ड्राइवर के तौर पर काम करता था. शुरुआत में उसकी मासिक आय लगभग 20 हजार रुपये थी, जो भारत लौटने के समय करीब 25 हजार रुपये तक पहुंच गई थी. अचानक पैर में दर्द और सूजन के बाद वहां उसका इलाज कराया गया. भारत लौटने पर जांच में किडनी संबंधी समस्या सामने आई.
बेटे को किडनी देने वाली शेरूनिका की तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती. परिवार के अनुसार उन्हें पेट में दर्द और कभी-कभी बुखार की शिकायत होती है. पिता शाहिद दोनों की देखभाल कर रहे हैं. अल्ताफ बोल नहीं पाता, इसलिए परिवार उसके हावभाव और शारीरिक स्थिति से उसकी जरूरतें समझता है.
एक तरफ बेटे को नियमित डायलिसिस की जरूरत है, वहीं मां की सेहत भी चिंता का विषय बनी हुई है. जमीन बेचने और लाखों रुपये खर्च होने के बाद परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है. अब उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि लगातार महंगे इलाज और डायलिसिस का खर्च कैसे जुटाया जाए.