पंजाब की सिख राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले नए समीकरण बनते दिख रहे हैं. बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा फिर राजनीतिक बहस में है. भगवंत मान सरकार जगतार सिंह हवारा के पैरोल की मांग उठा रही है. वहीं अकाली दल बलवंत सिंह राजोआणा के समर्थन में सक्रिय है.
लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल को पंजाब में पंथक राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा माना जाता रहा है लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है. पार्टी के भीतर कई गुट बन चुके हैं और उसका पुराना प्रभाव भी कमजोर हुआ है. ऐसे में आम आदमी पार्टी, अमृतपाल सिंह से जुड़े राजनीतिक समूह और कुछ धार्मिक संगठन उन मुद्दों पर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें कभी अकाली दल का मजबूत क्षेत्र माना जाता था. बंदी सिखों की रिहाई, बेअदबी, धार्मिक पहचान और सिख प्रतिनिधित्व जैसे विषय अब कई पक्षों के एजेंडे में हैं. इससे अकाली दल के सामने अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन वापस पाने की चुनौती बढ़ गई है.
भगवंत मान सरकार ने जगतार सिंह हवारा के पैरोल की मांग को मानवीय आधार से जोड़कर उठाया है. हवारा लंबे समय से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं और उनके मामले को लेकर कानूनी व राजनीतिक चर्चा होती रही है. दूसरी ओर अकाली दल बलवंत सिंह राजोआणा के समर्थन में खुलकर सामने आया है. राजोआणा फिलहाल पटियाला सेंट्रल जेल में बंद हैं और उनका मामला भी लंबे समय से पंजाब की पंथक राजनीति में चर्चा का विषय रहा है. दोनों मामलों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी रणनीति बना रहे हैं. इससे साफ है कि बंदी सिखों का मुद्दा अब केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश देने का जरिया भी बन रहा है.
इस पूरे समीकरण में अमृतपाल सिंह का फैक्टर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अमृतपाल से जुड़े समूह बंदी सिखों और पंथक मुद्दों के जरिए अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा दमदमी टकसाल भी राज्य में अपना संगठन बढ़ाने पर काम कर रही है. ऐसे माहौल में अकाली दल के लिए केवल पंथक मुद्दे उठाकर अपनी पुरानी पकड़ हासिल करना आसान नहीं होगा. उसे हर मुद्दे पर दूसरे राजनीतिक खिलाड़ियों से मुकाबला करना पड़ सकता है. AAP भी सिखों की धार्मिक और भावनात्मक चिंताओं से जुड़े विषयों को पूरी तरह अकाली दल या दूसरे समूहों के भरोसे छोड़ना नहीं चाहती.