मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. 1991 में वे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे. हालांकि, 1999 में एक छोटी सी घटना के बाद सेवा से बर्खास्त किए जाने पर उन्होंने संत जीवन अपना लिया था. लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के बाद, 54 वर्ष की उम्र में उन्होंने भगवा वस्त्र त्यागकर एक बार फिर से वही वर्दी पहन ली है, जिसे पाने में उनकी पूरी जवानी बीत गई.
बात 1990 के दशक के उत्तरार्ध की है, जब गिरवर सिंह असम में तैनात थे. एक दिन बाजार से लौटते समय उनकी गाड़ी से एक स्थानीय नागरिक की साइकिल में हल्की सी टक्कर लग गई, जिससे वह गिर गया. नागरिक ने शिकायत की कि उसकी साइकिल टूट गई है. यद्यपि गिरवर सिंह ने अधिकारियों को बताया कि उन्हें इस टक्कर का पता तक नहीं चला, फिर भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई और मेडिकल जांच के बाद नौ साल की सेवा के बावजूद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया.
नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह ने हार नहीं मानी और 1999 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इस दौरान वे साधु बनकर आश्रमों और मंदिरों में रहे, परंतु अदालत में अपनी कानूनी लड़ाई भी लगातार लड़ते रहे. वर्ष 2007 में हाईकोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आया, परंतु कानूनी प्रक्रियाओं और स्थगनादेशों के कारण मामला लंबा खींचता चला गया. इस दौरान उनके साथी अधिकारी पदोन्नति पाकर आगे बढ़ते रहे, जबकि वे भगवा वस्त्रों में तारीखें भुगतते रहे.
एक साइकिल ने वर्दी छीन ली, इंतज़ार ने जवानी ... खाकी छूटी तो भगवा ओढ़ लिया, पर उम्मीद नहीं छोड़ी ... 27 साल बाद वर्दी तो लौट आई गिरवर सिंह तोमर के पास ... बाबा गिरवर दास फिर सीआरपीएफ में गिरवर सिंह बन गये ... बस वो साल नहीं लौटे, जो इंसाफ की राह में कहीं खो गए ... pic.twitter.com/ziqODKarck
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) September 2, 2026
आखिरकार वर्ष 2025 में अदालत ने उनकी बर्खास्तगी को पूरी तरह से अवैध ठहराते हुए उन्हें पुनः सेवा में बहाल करने का स्पष्ट आदेश दिया. अदालत ने माना कि एक छोटी सी दुर्घटना के आधार पर किसी जवान को इस प्रकार बर्खास्त करना न्यायसंगत नहीं था. इस फैसले के साथ ही गिरवर सिंह के 26 वर्षों से चले आ रहे लंबे इंतजार और कठिन संघर्ष का अंत हुआ.
अदालत के आदेश के बाद 25 अगस्त को वे मुरैना से ट्रेन पकड़कर 26 अगस्त को छत्तीसगढ़ के बीजापुर पहुंचे. कैंप में रिपोर्ट करने से पहले वे एक नाई की दुकान पर गए, जहां वर्षों पुरानी जटाएं कटवाईं और लंबी सफेद दाढ़ी साफ करवाई. भगवा वस्त्र उतारकर दोपहर तक वे CRPF की 85वीं बटालियन में शामिल हो गए. आज कैंपस में वे सम्मानपूर्वक 'बाबा' के नाम से जाने जाते हैं और 54 साल की उम्र में अपनी प्यारी वर्दी के साथ देश की सेवा कर रहे हैं.