क्रेडिट कार्ड बंद होने के 10 साल बाद बैंक ने मांगे 33 लाख, कार्डहोल्डर ने लड़ी कानूनी लड़ाई और जीत लिए 5 लाख रुपए

10 साल पहले बंद क्रेडिट कार्ड पर 33 लाख रुपये की मांग करने वाले बैंक के खिलाफ उपभोक्ता ने कानूनी लड़ाई जीती. आयोग ने बैंक के व्यवहार को अनुचित मानते हुए पीड़ित को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.

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Sagar Bhardwaj

कर्नाटक के मैसूर के एक उपभोक्ता के साथ हुई बैंक की लापरवाही का मामला अब न्याय की मिसाल बन गया है. वेंकटेश नामक व्यक्ति ने 2010 में अपना क्रेडिट कार्ड बंद कर दिया था, लेकिन वर्षों बाद बैंक ने उन पर भारी बकाया का दावा कर दिया. लगातार नोटिस और दबाव के बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद राज्य आयोग ने बैंक के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उपभोक्ता को राहत दी.

10 साल बाद आया नोटिस

वेंकटेश ने अगस्त 2010 में अपना क्रेडिट कार्ड बंद करने के लिए आवेदन किया और 15,500 रुपये का भुगतान भी किया. बैंक ने उस समय कार्ड बंद होने की पुष्टि कर दी थी लेकिन 2020 में अचानक बैंक ने उन्हें 33.83 लाख रुपये की मांग का कानूनी नोटिस भेज दिया. इसके बाद भी बैंक ने कई बार संपर्क कर भुगतान का दबाव बनाया.

बैंक का लगातार दबाव

वेंकटेश ने जवाब में साफ कहा कि उनका कार्ड वर्षों पहले बंद हो चुका है और कोई लेन-देन भी नहीं हुआ. इसके बावजूद 2022 में एक और नोटिस भेजा गया. लगातार कॉल और संदेशों से परेशान होकर उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई. उनका कहना था कि इस वजह से उन्हें मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान दोनों झेलने पड़े.

आयोग का सख्त फैसला

जिला उपभोक्ता आयोग ने पहले 1 लाख रुपये का मुआवजा दिया, लेकिन वेंकटेश इससे संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने राज्य आयोग में अपील की. फरवरी 2026 में कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग ने बैंक की कार्रवाई को अनुचित व्यापार व्यवहार माना और मुआवजा बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया.

उपभोक्ता के अधिकार की जीत

आयोग ने यह भी माना कि बैंक की गलती से वेंकटेश की सिबिल स्कोर पर असर पड़ा और उन्हें ऋण मिलने में दिक्कत हुई. साथ ही उन्हें मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ी. आयोग ने बैंक को 1 लाख रुपये वकील फीस और 50 हजार रुपये खर्च के रूप में देने का आदेश भी दिया, जो उपभोक्ता अधिकारों की बड़ी जीत मानी जा रही है.