झारखंड हाईकोर्ट ने प्रशासनिक फैसलों में संतुलन और संवेदनशीलता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए एक संविदाकर्मी को बड़ी राहत दी है. बोकारो जिला ग्रामीण विकास अभिकरण में कार्यरत रंजीत कुमार हिमांशु की सेवा समाप्त करने के आदेश को अदालत ने निरस्त कर दिया.
अदालत ने माना कि मामूली आरोप के आधार पर किसी कर्मचारी की नौकरी समाप्त करना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है. इसके साथ ही बहाली और आंशिक बकाया वेतन देने का भी निर्देश जारी किया गया.
रंजीत कुमार हिमांशु पिछले करीब 17 वर्षों से DRDA बोकारो में संविदा पर चपरासी के रूप में कार्यरत थे. उन पर कार्यालय से चायपत्ती और कुछ बिस्किट घर ले जाने का आरोप लगाया गया. इसके बाद मार्च 2022 में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. हालांकि नोटिस में गायब सामग्री का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था.
सुनवाई के दौरान रंजीत की ओर से अदालत को बताया गया कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित सामग्री वापस कर दी गई थी. इसके बावजूद बिना विस्तृत जांच और पर्याप्त आधार के 2 मई 2022 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई. कर्मचारी ने इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ दंड तय करते समय आरोप और सजा के बीच संतुलन होना जरूरी है. अदालत ने माना कि यदि किसी गलती से सरकारी व्यवस्था को गंभीर नुकसान नहीं पहुंचा है, तो सबसे कठोर दंड देना उचित नहीं माना जा सकता.
हाईकोर्ट ने डीआरडीए बोकारो को निर्देश दिया कि रंजीत कुमार हिमांशु को 10 जुलाई से पहले सेवा में बहाल किया जाए. साथ ही 30 जुलाई तक 50 प्रतिशत बकाया वेतन का भुगतान भी किया जाए. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता और समानुपातिक दंड के सिद्धांत को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा.