menu-icon
India Daily

कोडनेम, घोस्ट सिम और पाक हैंडलर; दिल्ली ब्लास्ट केस में हुआ अब तक का सबसे बड़ा खुलासा

लाल किले के पास हुए विस्फोट की जांच में सामने आया कि पढ़े-लिखे डॉक्टरों ने पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संपर्क के लिए घोस्ट सिम और एन्क्रिप्टेड ऐप्स का इस्तेमाल किया. इससे सुरक्षा तंत्र की डिजिटल कमजोरी उजागर हुई.

Kanhaiya Kumar Jha
कोडनेम, घोस्ट सिम और पाक हैंडलर; दिल्ली ब्लास्ट केस में हुआ अब तक का सबसे बड़ा खुलासा
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर को हुए विस्फोट की जांच अब एक चौंकाने वाले मोड़ पर पहुंच गई है. सुरक्षा एजेंसियों को पता चला है कि इस हमले के पीछे कोई साधारण आतंकी गिरोह नहीं, बल्कि एक पढ़ा-लिखा ‘व्हाइट-कॉलर’ टेरर मॉड्यूल था. जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी डॉक्टरों ने पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों से संपर्क के लिए घोस्ट सिम और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का सहारा लिया. इस मामले ने डिजिटल सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों में डॉक्टर मुजम्मिल गनाई, अदील राथर और उनके सहयोगी शामिल हैं. ये सभी पेशे से पढ़े-लिखे थे और समाज में सामान्य नागरिक की तरह रहते थे. इसी वजह से उन पर लंबे समय तक किसी को शक नहीं हुआ. अधिकारियों का कहना है कि इस मॉड्यूल को पाकिस्तान से ऑपरेट किया जा रहा था और इसका मकसद राजधानी में बड़ा हमला करना था.

डुअल-फोन और घोस्ट सिम की रणनीति

आरोपियों ने सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए ‘डुअल-फोन’ रणनीति अपनाई थी. उनके पास दो या तीन मोबाइल फोन होते थे. एक फोन रोजमर्रा के निजी इस्तेमाल के लिए था, जबकि दूसरा केवल आतंकी गतिविधियों के लिए. इस दूसरे फोन में ऐसे सिम लगे थे, जो फर्जी या अनजान लोगों के आधार कार्ड पर जारी किए गए थे. इन्हें ही ‘घोस्ट सिम’ कहा जाता है.

एन्क्रिप्टेड ऐप्स और पाकिस्तानी हैंडलर

आरोपी व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए पाकिस्तान और PoK में बैठे हैंडलरों से बात करते थे. बातचीत के दौरान वे ‘उकासा’, ‘फैजान’ और ‘हाशमी’ जैसे कोडनेम का इस्तेमाल करते थे. जांच में सामने आया कि इन्हीं ऐप्स के जरिए यूट्यूब लिंक भेजकर IED बनाने की ट्रेनिंग दी गई और हमले की पूरी साजिश रची गई.

फर्जी सिम रैकेट और जांच का दायरा

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस मामले में फर्जी आधार कार्ड के जरिए सिम जारी करने वाले एक अलग रैकेट का भी पर्दाफाश किया है. इसी नेटवर्क के जरिए आतंकियों को सिम उपलब्ध कराए जाते थे. इस मॉड्यूल से जुड़े उमर-उन-नबी की पहचान भी हुई, जो विस्फोटक से भरी गाड़ी चलाते समय मारा गया था. इससे साफ हुआ कि नेटवर्क काफी गहरा और संगठित था.

केंद्र सरकार का कड़ा कदम

इस मामले के बाद केंद्र सरकार ने डिजिटल सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया है. दूरसंचार अधिनियम 2023 और नए टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियम लागू किए गए हैं. 28 नवंबर 2025 के निर्देशों के तहत अब ऐप-आधारित सेवाओं को केवल सक्रिय फिजिकल सिम वाले डिवाइस पर ही चलाने की अनिवार्यता होगी. नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. इसे आतंकी नेटवर्क की डिजिटल रीढ़ तोड़ने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.