दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सरकार अब नई तकनीकों का सहारा लेने जा रही है. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की पहल पर शुरू किए गए ‘इनोवेशन चैलेंज’ के तहत चुनी गई 22 अत्याधुनिक तकनीकों का जल्द ही जमीनी परीक्षण किया जाएगा. आने वाले कुछ हफ्तों में इन तकनीकों को राजधानी के प्रमुख प्रदूषण हॉटस्पॉट इलाकों में लगाया जाएगा, ताकि उनकी प्रभावशीलता को परखा जा सके.
पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने हाल ही में इस परियोजना की तैयारियों की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक की. उन्होंने बताया कि इस पहल के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से कुल 284 प्रस्ताव प्राप्त हुए थे. इन सभी प्रस्तावों का तकनीकी स्तर पर गहन मूल्यांकन किया गया. इसके बाद ‘इंटरनल टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी’ की जांच और समीक्षा के आधार पर 22 तकनीकों को ट्रायल के लिए चुना गया.
सरकार के अनुसार इन 22 तकनीकों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है. पहली श्रेणी वाहन उत्सर्जन नियंत्रण से जुड़ी है, जिसमें 13 तरह के उपकरण शामिल हैं. इनमें बसों और ट्रकों पर लगाए जाने वाले व्हीकल-माउंटेड एयर प्यूरीफायर, रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल सिस्टम और बायो-अल्कलाइन एग्जॉस्ट स्क्रबर जैसी तकनीकें शामिल हैं. इनका उद्देश्य वाहनों से निकलने वाले धुएं और हानिकारक कणों को कम करना है.
दूसरी श्रेणी एम्बिएंट एयर प्यूरीफिकेशन से संबंधित है. इस श्रेणी में नौ तकनीकें शामिल हैं, जिन्हें खुले क्षेत्रों, निर्माण स्थलों और औद्योगिक इलाकों में उपयोग के लिए तैयार किया गया है. इन समाधानों में डस्ट सप्रेशन यूनिट और स्मॉग कंट्रोल जैसी तकनीकें शामिल हैं, जो हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण कणों को कम करने में मदद कर सकती हैं.
पर्यावरण मंत्री ने स्पष्ट किया कि इन तकनीकों के चयन और आगे के इस्तेमाल का आधार पूरी तरह वैज्ञानिक आंकड़े और प्रमाण होंगे. उन्होंने कहा कि सरकार ऐसी तकनीकों को प्राथमिकता देना चाहती है जो वास्तव में प्रभावी हों और जिन्हें बड़े स्तर पर लागू करना भी संभव हो.
सरकार का मानना है कि इन ट्रायल के जरिए यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन-सी तकनीकें दिल्ली की हवा को साफ करने में सबसे ज्यादा असरदार साबित हो सकती हैं. यदि परीक्षण सफल रहे, तो इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू करने की योजना बनाई जा सकती है, जिससे राजधानी में प्रदूषण कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा सकेगा.