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सुकमा में ढहा माओवाद का किला, 25 लाख के इनामी नक्सली समेत 17 ने किया सरेंडर

बस्तर में माओवादी कमांडर पापाराव और उसके साथियों ने समर्पण कर दिया है. सुरक्षा बलों की सटीक रणनीति से अब संगठन कमजोर हो चुका है और सरकार का लक्ष्य 2026 तक नक्सलवाद को जड़ से मिटाना है.

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Kanhaiya Kumar Jha

रायपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादी आंदोलन अब अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. हाल ही में इंद्रावती क्षेत्र के खूंखार माओवादी पापाराव और उसके सहयोगियों की तस्वीरें सामने आई हैं, जो उनके समर्पण की पुष्टि करती हैं. यूट्यूबर पत्रकार रानू तिवारी के साथ दिखी इन तस्वीरों ने स्पष्ट कर दिया है कि संगठन के शीर्ष कैडर अब हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं. सुरक्षा बल उन्हें बीजापुर के कुटरू थाने ले आए हैं. जहां वे औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण करेंगे.

मंगलवार की सुबह बस्तर के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई, जब पत्रकार रानू तिवारी ने माओवादी पापाराव और अन्य लड़ाकों के साथ पहली तस्वीर साझा की. रानू तिवारी ने बताया कि ये सभी माओवादी अब शांति की मुख्यधारा में लौटने का मन बना चुके हैं. उन्हें सुरक्षित बाहर लाने के लिए सुरक्षा बलों की एक विशेष टीम जंगल के भीतर भेजी गई थी. सूत्रों के अनुसार दोपहर तीन बजे तक ये सभी बीजापुर के कुटरू थाने सुरक्षित पहुंच चुके हैं.

बस्तर में ढहता माओवादी किला 

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि बस्तर में माओवादी संगठन अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. हालांकि विज्जा हेमला और सोढ़ी केशा जैसे कुछ नाम अभी भी सक्रिय बताए जाते हैं, लेकिन उनकी ताकत अब न के बराबर रह गई है. संगठन के अधिकांश लड़ाके या तो हथियार डालकर अपने गांवों को लौट रहे हैं या फिर पड़ोसी राज्यों की सीमा की ओर भागने को मजबूर हैं. यह बदलाव बस्तर में लंबे समय से चली आ रही हिंसा के अंत का संकेत है.

दो वर्षों की मारक रणनीति का असर 

पिछले दो सालों में सुरक्षा बलों ने जिस सटीक इंटेलिजेंस और घेराबंदी की रणनीति पर काम किया है, उसने माओवादियों की कमर तोड़ दी है. इस दौरान बसव राजू, गुडसा उसेंडी, कोसा और हिड़मा जैसे बड़े और खतरनाक कमांडर मारे जा चुके हैं. बड़े कमांडरों के खात्मे ने निचले कैडरों के मनोबल को पूरी तरह गिरा दिया है, जिससे अब वे जंगलों में छिपने के बजाय पुलिस के सामने हथियार डालना ज्यादा सुरक्षित और बेहतर विकल्प समझ रहे हैं.

समर्पण और गिरफ्तारी के बड़े आंकड़े 

आंकड़े बताते हैं कि भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी और सुजाता जैसे शीर्ष नेताओं के समर्पण के बाद से अब तक 2700 से अधिक कैडर हथियार छोड़ चुके हैं. इतना ही नहीं इसी अवधि में सुरक्षा बलों ने 1800 से अधिक माओवादियों को गिरफ्तार भी किया है. इन सामूहिक सफलताओं ने बस्तर संभाग के उन इलाकों में भी सरकारी तंत्र की पहुंच बना दी है, जहां कभी नक्सलियों का समानांतर शासन चलता था. अब ये इलाके धीरे-धीरे विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं.

झारखंड की अंतिम चुनौती

भारत सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश से माओवादी हिंसा को पूरी तरह मिटाने का संकल्प लिया है. छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों में संगठन लगभग खत्म हो चुका है. अब सुरक्षा एजेंसियों के सामने आखिरी और सबसे बड़ी चुनौती झारखंड में छिपे पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा की है. मिसिर बेसरा पर सुरक्षा बलों की पैनी नजर है. सरकार को भरोसा है कि तय समयसीमा के भीतर झारखंड से भी इस चुनौती का समूल उन्मूलन कर दिया जाएगा.