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खत्म होगा नक्सलवाद! माओवादी खतरे को खत्म करने की समय सीमा करीब लेकिन 13 साल बाद भी जिंदा है झीरम घाटी का खौफ; जानें वजह

झीरम घाटी हमले के 13 साल बाद भी बस्तर में डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. सुरक्षा में सुधार हुआ है लेकिन विकास की कमी और अधूरी जांच अब भी चिंता का विषय बनी हुई है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
खत्म होगा नक्सलवाद! माओवादी खतरे को खत्म करने की समय सीमा करीब लेकिन 13 साल बाद भी जिंदा है झीरम घाटी का खौफ; जानें वजह
Courtesy: Pinterest

रायपुर: झीरम घाटी में हुए भीषण हमले को 13 साल बीत चुके हैं लेकिन डर और दर्द आज भी यहां के लोगों के मन में जिंदा है. केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय की है, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं दिखती.

25 मई 2013 को बस्तर के दरभा क्षेत्र में स्थित झीरम घाटी खून से लाल हो गई थी. माओवादियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था जिसमें 32 लोगों की मौत हुई थी. मृतकों में राज्य के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्या चरण शुक्ल शामिल थे.

कैसी थी उस समय की स्थिति?

यह हमला सिर्फ एक हिंसक वारदात नहीं था, बल्कि माओवादियों की ताकत का बड़ा प्रदर्शन भी था. उस समय बस्तर इलाका रेड कॉरिडोर का केंद्र माना जाता था. घने जंगल खराब सड़कें और कमजोर प्रशासनिक पहुंच के कारण नक्सलियों को खुलकर काम करने की आजादी मिली हुई थी.

कैसे हुआ बदलाव?

इस हमले के बाद सरकार और सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति बदली. बस्तर में सुरक्षा कैंप बढ़ाए गए, सड़कों का विस्तार किया गया और लगातार ऑपरेशन चलाए गए. इसका असर यह हुआ कि 2026 तक स्थिति में काफी बदलाव देखने को मिला है. अब बस्तर के कई इलाकों में सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हो गई है और बड़े हमलों में कमी आई है.

अभी कैसी है वहां की स्थिति?

हालांकि पूरी तस्वीर अभी भी जटिल बनी हुई है. झीरम घाटी और आसपास के गांवों में बुनियादी सुविधाएं अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई हैं. कई जगहों पर सड़कें अधूरी हैं, स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं और पानी-बिजली की समस्या बनी हुई है. स्थानीय लोग मानते हैं कि पहले जैसा डर तो कम हुआ है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

घाटी में आज भी उस हमले के निशान देखे जा सकते हैं. सड़क किनारे शहीद स्मारक बना है लेकिन जंगल के भीतर एक जंग लगा वाहन का दरवाजा अब भी उस दिन की भयावहता की याद दिलाता है.

पुलिस अधिकारियों ने क्या बताया?

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, उस हमले के पीछे जिम्मेदार दरभा डिवीजन कमेटी को काफी हद तक खत्म कर दिया गया है. कई माओवादी मारे गए, गिरफ्तार हुए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं.

फिर भी 13 साल बाद भी इस मामले की जांच पूरी नहीं हो सकी है. National Investigation Agency, Central Bureau of Investigation और अन्य एजेंसियों ने जांच की, लेकिन साजिश की पूरी सच्चाई अब तक सामने नहीं आई है.