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मखाना..चावल से लेकर खाद और रिफाइन तक, ईरान-इजरायल युद्ध ने तोड़ी बिहार की कमर; जानें कितना पड़ा असर

ईरान-इजरायल युद्ध के कारण बिहार में मखाना, चावल और फल के निर्यात पर असर पड़ा है. खाद की किल्लत और कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है. रिफाइन तेल और गैस सप्लाई प्रभावित होने से आर्थिक संकट गहराने की आशंका है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
मखाना..चावल से लेकर खाद और रिफाइन तक, ईरान-इजरायल युद्ध ने तोड़ी बिहार की कमर; जानें कितना पड़ा असर
Courtesy: Pinterest

पटना: मध्य पूर्व में जारी शत्रुता ने बिहार के व्यापारियों से लेकर किसानों तक सभी को संकट में डाल दिया है. चावल से लेकर मखाने तक के निर्यात, साथ ही आयात जिसमें उर्वरक और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री शामिल हैं. सभी को झटका लगा है. इसके अलावा शिपिंग जहाजों की कमी के कारण रिफाइंड तेल के आयात में भी गिरावट आ रही है.

बिहार राज्य मत्स्य सहकारी संघ के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप बताते हैं कि मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष ने वास्तव में दुबई जैसे बाजारों के लिए निर्धारित 300 करोड़ रुपये के मखाना व्यापार को बाधित कर दिया है. वह दोहराते हैं कि स्थापित आपूर्ति श्रृंखला जहां मखाने को दुबई में दोबारा पैक करके अमेरिका और विभिन्न यूरोपीय देशों में वितरित किया जाता था. 

युद्ध का क्या पड़ा इसका असर?

अब युद्ध के कारण टूटने लगी है. बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस से जुड़े अर्थशास्त्री, सुधांशु कुमार चेतावनी देते हैं कि यह संघर्ष बिहार के निर्यातकों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है. राज्य से बासमती चावल और मखाने का निर्यात पहले ही ठप हो चुका है. इसके अलावा युद्ध का आगामी लीची और आम की फसलों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है.

बिहार सालाना लगभग 4 मिलियन टन उर्वरक की खपत करता है. BISCOMAUN के मुख्य उर्वरक अधिकारी, वाई.पी. सिंह बताते हैं कि इस कुल खपत में से अकेले 3 मिलियन टन यूरिया होता है. युद्ध के कारण उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला चरमरा गई है. विदेशों से आयातित तैयार उर्वरकों और उनके घरेलू उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल दोनों की खरीद करना अब बेहद मुश्किल हो गया है. 

प्राकृतिक गैस की सामान्य कमी के बीच गैस की आपूर्ति जो उर्वरक निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण इनपुट है उसमें 40 प्रतिशत तक की कटौती कर दी गई है. 

क्या पड़ रहा बाजार पर असर?

युद्ध के कारण खाद की कमी होने के डर से बिचौलियों ने अभी से बाजार पर कब्जा करना शुरू कर दिया है. वे जमाखोरी और सट्टेबाज़ी जैसी हरकतों में लिप्त हैं. फिलहाल खेतों में खाद की कोई तुरंत जरूरत नहीं है. फिर भी बाजार से यूरिया और DAP बड़े पैमाने पर खरीदे जा रहे हैं. बिहार में खाद की बढ़ती मांग के कारण बाजार में कीमतें पहले ही तेजी से बढ़ने लगी हैं. 

जो खाद आमतौर पर ₹265 प्रति बोरी बिकती है, वह अब पटना में ₹300 से ₹350 के बीच और कटिहार में ₹500 प्रति बोरी तक बिक रही है. बिहार में खाद की मांग आमतौर पर जून और जुलाई के महीनों में सबसे ज्यादा होती है.