Independence Day 2026: अंग्रेजों का ‘बांकीपुर लॉन’ कैसे बना गांधी मैदान? इस एक चिट्ठी ने बदल दिया इतिहास
पटना का गांधी मैदान कभी अंग्रेजों के दौर में बांकीपुर लॉन कहलाता था. आजादी के बाद मुजफ्फरपुर के विश्वनाथ प्रसाद चौधरी की अनुशंसा पर 6 अप्रैल 1948 को सरकार ने इसका नाम बदलकर गांधी मैदान कर दिया.
पटना: बिहार की राजधानी पटना के बारे में जब भी बात होती है तो यहां के गांधी मैदान का जिक्र जरुर होता है. गांधी मैदान केवल एक खुला मैदान नहीं, बल्कि बिहार के सामाजिक, राजनीतिक और स्वतंत्रता आंदोलन की जीवंत विरासत है. जहां आज हर साल तिरंगा लहराता है और लाखों लोग राष्ट्रीय आयोजनों में जुटते हैं, वहीं यही स्थान कभी अंग्रेजों के शासनकाल में बांकीपुर लॉन के नाम से जाना जाता था.
दिलचस्प बात यह है कि इसका नाम किसी बड़े आंदोलन से नहीं, बल्कि एक नागरिक की पहल से बदला गया. मुजफ्फरपुर निवासी विश्वनाथ प्रसाद चौधरी ने सरकार को पत्र लिखकर इस मैदान का नाम महात्मा गांधी के सम्मान में बदलने की मांग की. उनकी अनुशंसा स्वीकार होने के बाद 6 अप्रैल 1948 को यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया.
एक चिट्ठी ने बदल दिया मैदान का नाम
आजादी के कुछ महीनों बाद विश्वनाथ प्रसाद चौधरी ने बिहार सरकार को पत्र भेजकर सुझाव दिया कि बांकीपुर मैदान का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा जाए. सरकार ने इस प्रस्ताव पर विचार किया और दो महीने के भीतर नाम परिवर्तन का आदेश जारी कर दिया. 6 अप्रैल 1948 को आधिकारिक आदेश लागू हुआ और अंग्रेजों के समय का बांकीपुर लॉन हमेशा के लिए गांधी मैदान बन गया. इस नाम परिवर्तन से जुड़े मूल पत्र आज भी बिहार राज्य अभिलेखागार में सुरक्षित रखे गए हैं.
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सांप्रदायिक दंगों के बीच पटना पहुंचे थे बापू
1946 में देश के कई हिस्सों में हिंदू मुस्लिम तनाव भड़क उठा था. 16 अगस्त को कलकत्ता में हुए सांप्रदायिक दंगों का असर बिहार तक पहुंचा और हालात बेहद गंभीर हो गए. बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवारों को पलायन करना पड़ा, जबकि सैकड़ों गांव हिंसा की चपेट में आ गए. ऐसे कठिन समय में महात्मा गांधी बिहार पहुंचे और लगभग 60 दिनों तक पटना में रहकर शांति स्थापित करने का प्रयास किया. उन्होंने डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा सहित कई नेताओं और समाज के प्रतिनिधियों से लगातार संवाद किया.
इसी मैदान में हुई थी ऐतिहासिक प्रार्थना सभा
पटना प्रवास के दौरान महात्मा गांधी ने तत्कालीन पटना लॉन, यानी आज के गांधी मैदान में एक विशाल प्रार्थना सभा आयोजित की. इस सभा में करीब एक लाख लोगों की उपस्थिति बताई जाती है, जिसने इसे उस दौर की सबसे बड़ी जनसभाओं में शामिल कर दिया. अपने संबोधन में गांधीजी ने हिंसा छोड़ने, नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने और अहिंसा के मार्ग पर लौटने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि वे डॉ. सैयद महमूद का संदेश मिलते ही बिना देर किए पटना पहुंचे हैं.
बापू की अपील का लोगों पर पड़ा गहरा असर
प्रार्थना सभा के बाद गांधीजी की बातों का असर समाज में साफ दिखाई दिया. पटना के सिपारा गांव के एक निवासी ने उन्हें पत्र लिखकर अपने किए पर पश्चाताप व्यक्त किया और क्षमा मांगी. यह घटना उस दौर में सामाजिक बदलाव की प्रतीक मानी गई. गांधीजी ने भरोसा दिलाया कि जो मुस्लिम परिवार गांव छोड़ चुके हैं, उन्हें सम्मान के साथ वापस घर लौटने के लिए मनाने का हर संभव प्रयास किया जाएगा. उनका उद्देश्य केवल शांति नहीं, बल्कि विश्वास बहाल करना था.
आज भी आंदोलनों और लोकतंत्र का प्रतीक है गांधी मैदान
गांधी मैदान ने स्वतंत्रता के बाद भी बिहार की राजनीति और लोकतंत्र के अनेक महत्वपूर्ण अध्याय देखे हैं. बड़े जनआंदोलन, ऐतिहासिक रैलियां, सत्ता परिवर्तन और राष्ट्रीय समारोह इसी मैदान से जुड़े रहे हैं. आज यह स्थान केवल पटना की पहचान नहीं, बल्कि उस विचार का प्रतीक है जिसमें संवाद, अहिंसा और लोकतांत्रिक भागीदारी सर्वोपरि है. अंग्रेजों का बांकीपुर लॉन से गांधी मैदान तक का सफर भारतीय इतिहास की एक ऐसी कहानी है, जो एक नागरिक की पहल और महात्मा गांधी की विरासत दोनों को अमर कर देता है.