क्रिकेट में निष्पक्षता ही इस खेल की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है. जब भी मैच फिक्सिंग जैसा मामला सामने आता है, खेल की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं. हाल ही में श्रीलंका के पूर्व स्पिनर सचित्र सेनानायके को लंका प्रीमियर लीग से जुड़े मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि भारत में मैच फिक्सिंग को कानून कैसे देखता है और दोषी खिलाड़ियों पर किस तरह की कार्यवाही की जा सकती है.
इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल मैच फिक्सिंग को भ्रष्टाचार की सबसे गंभीर श्रेणी में रखता है. एंटी करप्शन कोड के तहत दोषी पाए जाने पर खिलाड़ी, अधिकारी या किसी भी संबंधित व्यक्ति पर पांच साल या उससे ज्यादा समय का प्रतिबंध लगाया जा सकता है. गंभीर मामलों में आजीवन प्रतिबंध भी लगाया जाता है, जिससे वह किसी भी मान्यता प्राप्त क्रिकेट गतिविधि का हिस्सा नहीं बन सकता.
भारत में अभी तक मैच फिक्सिंग को लेकर कोई अलग विशेष कानून लागू नहीं है. ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां भारतीय दंड संहिता की धोखाधड़ी जैसी धाराओं (धारा 420) के तहत कार्यवाही करती हैं. विशेषज्ञ लंबे समय से इस विषय पर अलग कानून बनाने की जरूरत बताते रहे हैं, ताकि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो सके.
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एंटी करप्शन यूनिट का गठन किया है. खिलाड़ियों, कोच और सपोर्ट स्टाफ को किसी भी संदिग्ध संपर्क या गतिविधि की जानकारी तुरंत एसीयू को देना अनिवार्य होता है. नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाती है.
अगर किसी खिलाड़ी पर मैच फिक्सिंग या भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो BCCI उसे लंबे समय के लिए निलंबित कर सकता है. मामले की गंभीरता के आधार पर आजीवन प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है. जांच में सहयोग नहीं करने या सबूत छिपाने जैसी परिस्थितियों में सजा और अधिक कठोर हो सकती है.
मैच फिक्सिंग केवल एक खिलाड़ी के करियर को प्रभावित नहीं करती, बल्कि करोड़ों प्रशंसकों के भरोसे को भी नुकसान पहुंचाती है. यही कारण है कि ICC और BCCI दोनों भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हैं. खेल की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सख्त नियमों और सतर्क निगरानी को सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है.