पेट डॉग से जुदाई बर्दाश्त कर सका ये इंडियन कपल, अपने साथ रखने के लिए खर्च दी सारी दौलत, दिल छु लेगी ये स्टोरी
दिव्या और जॉन की रोजमर्रा की जिंदगी स्काई के इर्द-गिर्द घूमती थी. स्काई उनकी हंसी, सुकून और भावनात्मक सहारा था. दोनों साधारण जिंदगी जीते थे और भविष्य के लिए बचत करते थे, लेकिन स्काई उनकी प्राथमिकता बना रहा.
नई दिल्ली: यह कहानी सिर्फ एक पालतू कुत्ते को विदेश ले जाने की नहीं है, बल्कि उस रिश्ते की है जिसे अक्सर लोग कम आंकते हैं. हैदराबाद के सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल दिव्या और जॉन के लिए उनका गोल्डन रिट्रीवर स्काई (पालतु कुत्ता) परिवार का हिस्सा था.
जब नौकरी के लिए उन्हें ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा, तो दिल वहीं छूट गया. नियम कठिन थे और खर्च भारी था, लेकिन उनका फैसला साफ था. स्काई को छोड़ना उनके लिए विकल्प ही नहीं था.
स्काई के इर्द-गिर्द घूमती जिंदगी
दिव्या और जॉन की रोजमर्रा की जिंदगी स्काई के इर्द-गिर्द घूमती थी. स्काई उनकी हंसी, सुकून और भावनात्मक सहारा था. दोनों साधारण जिंदगी जीते थे और भविष्य के लिए बचत करते थे, लेकिन स्काई उनकी प्राथमिकता बना रहा. उनके लिए वह एक जानवर नहीं, बल्कि बच्चा था.
ऑस्ट्रेलिया जाना और दूरी का दर्द
मेलबर्न शिफ्ट होने के बाद खालीपन और गहरा हो गया. उधर भारत में स्काई की हालत बिगड़ने लगी. डॉक्टरों ने बताया कि उसे सेपरेशन एंग्जायटी हो रही है. दौरे पड़ने लगे और बेचैनी बढ़ गई. यह सुनकर दिव्या और जॉन खुद को दोषी मानने लगे. स्काई की तकलीफ ने उनके फैसले को और पक्का कर दिया.
नियम, खर्च और संघर्ष
ऑस्ट्रेलिया के कड़े पेट नियम सबसे बड़ी बाधा थे. भारत से सीधे कुत्ते को ले जाना मुमकिन नहीं था. 180 दिन किसी रैबीज-फ्री देश में क्वारंटीन जरूरी था. कुल खर्च करीब 15 लाख रुपये बैठता था. लोगों ने समझाया कि नया पालतू ले लो, लेकिन दोनों ने स्काई को लेकर अपना इरादा नहीं बदला.
6 महीने का लंबा इंतजार
उन्होंने क्वारंटीन के लिए दुबई को चुना. वहां स्काई को प्रीमियम सुविधा में रखा गया. वीडियो कॉल ही उनका सहारा बने. हर दिन एक ही सवाल होता था. क्या स्काई ठीक है. क्या उसने खाना खाया. फोन पर उसकी आवाज सुनकर जॉन कई बार टूट जाते थे. छह महीने मुश्किल में कटे.
मिलन का अनमोल पल
आखिर स्काई मेलबर्न पहुंचा और दस दिन के क्वारंटीन के बाद वह पल आया. जैसे ही स्काई ने दिव्या और जॉन को देखा, उसकी आंखों की चमक सब कुछ कह गई. आज वह ऑस्ट्रेलिया की खुली हरियाली में दौड़ता है. इस कहानी में प्यार ने पैसों और सीमाओं को हराया है. यह याद दिलाती है कि सच्चा लगाव आज भी जिंदा है.