नई दिल्ली: देश में लिवर संबंधी बीमारियां अब एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही हैं. 'लैंसेट साउथईस्ट एशिया' में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस संबंध में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. डॉ. शांतनु सेनगुप्ता के नेतृत्व में हुए इस शोध में 27 शहरों के 7,000 से अधिक लोगों का डेटा शामिल किया गया. रिपोर्ट बताती है कि फैटी लिवर का संबंध अब केवल शराब से नहीं, बल्कि खराब खान-पान और मोटापे से भी है. यह स्थिति आगे चलकर लिवर कैंसर का कारण बन सकती है.
आमतौर पर लिवर की बीमारियों को शराब के सेवन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह शोध एक बिल्कुल अलग ही कहानी बयां करता है. डॉ. सेनगुप्ता ने स्पष्ट किया कि अध्ययन में उन लोगों को शामिल किया गया जो शराब का सेवन नहीं करते थे. इसके बावजूद 40 प्रतिशत लोगों में फैटी लिवर पाया गया. यह दर्शाता है कि हमारी बदलती जीवनशैली और गैर-अल्कोहलिक कारक लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसे अब फाइब्रोसिस के रूप में पहचाना गया है.
अध्ययन ने भारत के विभिन्न शहरों में फैटी लिवर की स्थिति का एक नया नक्शा तैयार किया है. शोध के अनुसार रुड़की और भोपाल में यह दर सर्वाधिक 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि तिरुवनंतपुरम में यह सबसे कम 27 प्रतिशत है. दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों में यह आंकड़ा 37 से 42 प्रतिशत के बीच है. पुरुषों में इसकी दर 45.9 प्रतिशत है, जो महिलाओं की तुलना में बहुत अधिक पाई गई है.
फैटी लिवर की समस्या का सीधा संबंध वजन और ब्लड शुगर के असंतुलन से पाया गया है. शोध में फैटी लिवर से पीड़ित 93.7 प्रतिशत लोग मोटापे का शिकार मिले. साथ ही, इन मरीजों में एचबीए1सी का स्तर भी सामान्य 5.7 से अधिक रहा. इससे यह संकेत मिलता है कि पेट की चर्बी बढ़ने से डायबिटीज का खतरा बढ़ता है और लिवर इसका पहला शिकार होता है. यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जो फिटनेस को नजरअंदाज करते हैं.
फाइब्रोसिस लिवर की क्षति का वह शुरुआती चरण है जो आगे चलकर लिवर फेलियर या कैंसर का रूप ले सकता है. फैटी लिवर वाले मरीजों में फाइब्रोसिस की दर 6.3 प्रतिशत पाई गई, जो सामान्य आबादी की तुलना में बहुत अधिक है. जोरहाट में फाइब्रोसिस की दर सबसे ज्यादा 8.3 प्रतिशत दर्ज की गई. दिल्ली और जम्मू में भी इसके मामले तेजी से बढ़े हैं. खान-पान और क्षेत्रीय जेनेटिक्स इसमें बड़ी भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं.
चूंकि हर व्यक्ति के लिए फाइब्रोस्कैन जैसे महंगे टेस्ट कराना संभव नहीं है, इसलिए शोधकर्ताओं की टीम एक सरल स्क्रीनिंग सिस्टम विकसित कर रही है. इसमें खून के बायोमार्कर, उम्र और वजन जैसी जानकारियों का उपयोग करके संभावित मरीजों की पहचान की जाएगी. डॉ. सेनगुप्ता के अनुसार, समय रहते जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस संकट को टाला जा सकता है. लिवर स्वास्थ्य पर ध्यान देना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है.