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Inspiring Journey: बीहड़ में बंदूक, अब हाथ में कलम; 'डॉ. चंपा' की कहानी सुनकर आप भी रह जाएंगे हैरान

गढ़चिरौली की गीता नरोटे ने बचपन में पिता को खोया, चार बहनों की जिम्मेदारी संभाली और हालात से मजबूर होकर माओवादी संगठन तक पहुंच गईं.

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Edited By: Reepu Kumari
Inspiring Journey: बीहड़ में बंदूक, अब हाथ में कलम; 'डॉ. चंपा' की कहानी सुनकर आप भी रह जाएंगे हैरान
Courtesy: Grok

Inspiring Journey: कभी जंगलों में बंदूक लेकर चलने वाली एक महिला आज किताबों के बीच अपना भविष्य तलाश रही है. यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन पूरी तरह सच है. छत्तीसगढ़ के बस्तर में आत्मसमर्पण करने वाली 36 वर्षीय गीता नरोटे ने हाल ही में दसवीं की ओपन स्कूल परीक्षा पास की है. जिस उम्र में लोग करियर की ऊंचाइयां छूते हैं, उस उम्र में उन्होंने नए सिरे से पढ़ाई शुरू करने का हौसला दिखाया है.

गीता मूल रूप से महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के सुदूर आदिवासी गांव गुरेकासा की रहने वाली हैं. बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया और घर की सबसे बड़ी बेटी होने के नाते पूरा बोझ उनके कंधों पर आ गया. पढ़ाई, खेल और सपनों की जगह उन्हें चार छोटी बहनों की फिक्र करनी पड़ी. यहीं से उनकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी.

छठी कक्षा में छूटा स्कूल, फिर जेल तक पहुंची राह

गीता उस समय छठी कक्षा में थीं, जब उनके पिता की हत्या हुई. उन्होंने पढ़ाई छोड़कर परिवार संभालना बेहतर समझा. उनका गांव जंगली इलाके में था, जहां माओवादियों की आवाजाही रहती थी. गांव वालों को मजबूरी में उन्हें खाना और पानी देना पड़ता था. स्कूल छोड़ने के करीब एक साल बाद गीता को माओवादी समर्थक होने के शक में गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल जेल में रहना पड़ा.

डर के साए में संगठन की राह, मिली नई पहचान

जेल से बाहर आने के बाद भी गीता को दोबारा गिरफ्तार होने का डर सताता रहा. समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में उन्होंने बताया कि इसी डर के कारण वह 2004 में माओवादी समूह से जुड़ गईं. संगठन में वह मेडिकल टीम के साथ काम करती थीं और दूरदराज के इलाकों में बीमार लोगों का इलाज करती थीं. लोग उन्हें 'डॉ. चंपा' कहकर पुकारने लगे और यही नाम उनकी पहचान बन गया.

सरेंडर के बाद किताबों से दोस्ती

गीता ने बस्तर के जगदलपुर में आत्मसमर्पण किया, जहां उनके साथ 210 माओवादियों ने हथियार डाले. इस समूह की अगुवाई वरिष्ठ कैडर रुपेश कर रहे थे. गीता के मुताबिक, जब उन्होंने बस्तर रेंज के आईजी और दूसरे अधिकारियों के सामने पढ़ने की इच्छा रखी, तो उन्हें मदद का भरोसा मिला. सरेंडर नीति के तहत मिली 50-50 हजार रुपये की राशि में से कुछ पैसों से उन्होंने किताबें खरीदीं और पढ़ाई शुरू कर दी.

टाइम-टेबल, पुराने पेपर और नर्स बनने का सपना

तेलंगाना के रहने वाले पूर्व माओवादी कैडर सेतु उर्फ श्याम, जो संगठन में शिक्षक थे, उन्होंने भी पढ़ाई में साथियों की मदद की. सबने टाइम-टेबल बनाकर पढ़ाई की और पिछले सालों के मॉडल पेपर हल किए. नतीजा यह रहा कि दसवीं की परीक्षा पास हो गई. बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ कुमार सिन्हा के अनुसार, शिक्षा से पूर्व कैडर समाज से जुड़ सकेंगे और रोजगार पा सकेंगे. गीता अब नर्सिंग कोर्स करके लोगों की सेवा करना चाहती हैं.