Success Story: परेशानियां हम सभी के जीवन में आती हैं, लेकिन कुछ लोग मुश्किलों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बना लेते हैं. बिहार की बेटी रेणुका रंजन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. जिन्होनें बिखरने की जगह निखरना चुना.
बिहार के अररिया जिले के छोटे से गांव सिमरा की रेणुका रंजन ने जिस तरह मुश्किल परिस्थितियों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी, वह किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है.
रेणुका के सामने सिर्फ गरीबी ही चुनौती नहीं थी. परिवार का अशांत माहौल, आसपास के लोगों के ताने और पढ़ाई के लिए जगह की कमी भी उनके रास्ते में आती रही. गांव में कुछ लोग उनकी पढ़ाई का मजाक उड़ाते और कहते कि जब औकात नहीं है तो पढ़ाई क्यों करती हो. लेकिन मां सत्यभामा ने हर मुश्किल में बेटी का साथ दिया. यही समर्थन रेणुका के संघर्ष में उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.
रेणुका बेहद गरीब परिवार में पली बढ़ीं. उनका बचपन फूंस की छत और कच्ची दीवारों वाले घर में बीता. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि पढ़ाई के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं. स्कूल में वे साइंस स्ट्रीम लेना चाहती थीं, लेकिन परिवार के हालात ने उन्हें आर्ट्स से पढ़ाई करने के लिए मजबूर किया.
घर में बिजली की सुविधा नहीं थी. यहां तक कि लालटेन भी हमेशा उपलब्ध नहीं रहती थी. ऐसे में रेणुका डिबिया की रोशनी में पढ़ाई करती थीं. कम उम्र से ही उन्हें समझ आ गया था कि अगर जिंदगी बदलनी है तो पढ़ाई को किसी भी हालत में छोड़ना नहीं है.
रेणुका के मुताबिक, उनके घर के पास शराब का ठेका था. पिता, चाचा और परिवार के अन्य पुरुषों के शराब पीने के कारण अक्सर घर में विवाद होता था. कई बार उनके पिता शराब के नशे में मां सत्यभामा के साथ मारपीट भी करते थे. ऐसे माहौल में रेणुका के लिए पढ़ाई पर ध्यान लगाना आसान नहीं था.
इसके बावजूद उनकी मां ने बेटी की शिक्षा को रुकने नहीं दिया. आर्थिक परेशानी और घरेलू हिंसा जैसी परिस्थितियों के बीच भी उन्होंने रेणुका को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. मां का यही भरोसा रेणुका के लिए उस समय सहारा बना, जब आसपास के लोग उन्हें पढ़ाई छोड़ने की सलाह दे रहे थे.
रेणुका को पढ़ाई के दौरान गांव के लोगों के ताने भी सुनने पड़े. उनकी कम हाइट को लेकर भी उनका मजाक बनाया जाता था. कुछ लोग उनसे कहते थे कि जब पढ़ाई के लिए पैसे और साधन नहीं हैं तो पढ़ने की जरूरत क्या है. उन्हें झाड़ू पोछा करने की बात कहकर पढ़ाई छोड़ देने के लिए कहा जाता था.
रेणुका ने इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने इन्हीं तानों को आगे बढ़ने की वजह बना लिया. बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने संघर्ष को याद करते हुए बताया कि लोगों की बातें सुनकर भी उनकी मां ने उन्हें संभाला और पढ़ाई जारी रखने के लिए हौसला दिया.
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद रेणुका ने आईटीआई का रास्ता चुना. उन्हें बताया गया था कि आईटीआई के बाद रेलवे में सरकारी नौकरी के अवसर मिल सकते हैं. वे कुछ समय पटना में रहकर पढ़ाई करने लगीं. पैसे की कमी के कारण अलग कमरा लेना संभव नहीं था, इसलिए वे कुछ आईटीआई की छात्राओं के साथ रहने लगीं.
जिस कमरे में वे रहती थीं, उसकी टीन की छत गर्मियों में काफी गर्म हो जाती थी. पढ़ते समय वे बाल्टी में पैर डालकर बैठती थीं. जब कमरे में गर्मी या शोर अधिक होता, तो वे बाथरूम में जाकर पढ़ती थीं. उनके लिए वह जगह शांति और थोड़ी ठंडक पाने का साधन बन गई थी.
रेणुका ने इलेक्ट्रीशियन ट्रेड से आईटीआई की पढ़ाई पूरी की. उनका लक्ष्य रेलवे में सरकारी नौकरी हासिल करना था, लेकिन आर्थिक स्थिति को देखते हुए कोचिंग करना संभव नहीं था. उन्होंने अलग अलग शिक्षकों से मदद मांगी और परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी. इस दौरान उन्हें कई बार असफलता मिली.
कुछ फिजिकल टेस्ट में कम हाइट के कारण भी उन्हें बाहर होना पड़ा. लगातार मिले इन झटकों के बावजूद उन्होंने कोशिश बंद नहीं की. आखिरकार उनकी मेहनत सफल हुई और उनका चयन बिजली विभाग में टेक्नीशियन ग्रेड 3 के पद पर हो गया. रेलवे में नौकरी का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए रेणुका की तैयारी जारी है. उनकी कहानी बताती है कि मुश्किलें रास्ता रोक सकती हैं, लेकिन मजबूत इरादे वाले इंसान को हमेशा के लिए रोक नहीं सकतीं.