ईरान युद्ध पर बढ़ा विवाद, समर्थन न देने पर US ने लिया सख्त एक्शन; जर्मनी से वापस बुलाएगा 5000 अमेरिकी सैनिक
अमेरिका ने जर्मनी से 5,000 सैनिक हटाने का फैसला लिया है. ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप और जर्मनी के बीच बढ़ते मतभेद इसकी बड़ी वजह माने जा रहे हैं. चलिए जानते हैं इस कदम से नाटो संबंधों पर क्या पड़ेगा असर.
नई दिल्ली: अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का बड़ा फैसला लिया है. पेंटागन ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की. इस कदम को अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ते तनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. खासतौर पर ईरान संघर्ष को लेकर अमेरिका और जर्मनी के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक यह फैसला उस समय लिया गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच तीखी बयानबाजी हुई. फ्रेडरिक मर्ज ने ईरान के साथ बातचीत को लेकर अमेरिका की रणनीति की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि तेहरान अमेरिका को अपमानित कर रहा है. इसके बाद पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उनकी टिप्पणी को अनुचित और मददगार नहीं बताया.
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने क्या दिया आदेश?
पेंटागन ने कहा कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सैनिकों की वापसी का आदेश दिया है. यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी. इसके बाद यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या फिर उसी स्तर पर पहुंच जाएगी, जो रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले थी. रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ाई थी.
इस फैसले के तहत जर्मनी में तैनात एक ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को वापस बुलाया जाएगा. इसके अलावा लंबी दूरी की फायर बटालियन की प्रस्तावित तैनाती भी रद्द कर दी गई है.
जर्मनी में फिलहाल कितने सैनिक मौजूद हैं?
जर्मनी में फिलहाल करीब 35,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. यह अमेरिका का यूरोप में सबसे बड़ा सैन्य बेस माना जाता है. यहां से ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स और कई सैन्य ऑपरेशन संचालित किए जाते हैं.
किस बात की वजह से है दोनों देशों में नाराजगी?
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका नाटो सहयोगियों से नाराज है क्योंकि उसका मानना है कि ईरान संकट के दौरान यूरोपीय देशों ने पर्याप्त समर्थन नहीं दिया. डोनाल्ड ट्रंप कई बार यूरोपीय देशों की आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि यूरोप ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा में सहयोग नहीं किया, जबकि यह वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम मार्ग है.
वहीं जर्मनी का कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू करने से पहले यूरोपीय देशों से कोई सलाह नहीं ली. इससे दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया है.