जीवन बीमा गिरवी रखकर इस फिल्ममेकर ने बनाई थी पहली फिल्म, ऐसे बने दुनिया के सबसे बड़े सुपरस्टार
यह कहानी एक ऐसे फिल्ममेकर की है जिसने अपने सपनों को सच करने के लिए अपनी जीवन बीमा तक गिरवी रख दी थी. दो साल तक कोई खरीदार न मिलने पर फिल्ममेकर ने हार नहीं मानी और अंत में दुनिया भर में नाम कमा लिया.
मुंबई: कभी कभी एक सपना इतना बड़ा होता है कि उसके सामने हर मुश्किल छोटी लगने लगती है. लेकिन जब वही सपना बार बार टूटने लगे, तो उसे बचाना आसान नहीं होता. ऐसी ही एक कहानी सत्यजीत रे की हैं, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया. 2 साल तक उन्हें कोई खरीदार नहीं मिला, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. और फिर एक दिन वही फिल्म उन्हें दुनिया के सबसे बड़े फिल्ममेकर में शामिल कर गई.
जब सत्यजीत रे ने अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली बनाने का फैसला किया, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी वो है 'पैसा'. वे हर प्रोड्यूसर के पास एक खास नोटबुक लेकर जाते थे. इस नोटबुक में फिल्म के सीन के स्केच बने होते थे ताकि लोग उनकी सोच को समझ सकें. लेकिन उस समय किसी को भी यह कहानी कमर्शियल नहीं लगी. हर जगह से उन्हें ना सुनने को मिला. दो साल तक लगातार कोशिश करने के बाद भी उन्हें कोई फाइनेंसर नहीं मिला.
जब जीवन बीमा भी रखनी पड़ी थी गिरवी
जब सभी रास्ते बंद हो गए, तब सत्यजीत रे ने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी. इसके साथ ही उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी पैसे उधार लिए. यह कदम आसान नहीं था. लेकिन उनके लिए यह सिर्फ फिल्म नहीं थी, बल्कि एक सपना था जिसे वे किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहते थे.
सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता में हुआ था. बचपन से ही उन्हें संगीत, चित्रकला और फिल्मों में दिलचस्पी थी. उनकी मां के कहने पर वे शांतिनिकेतन गए और वहां कला की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने एक ऐड कंपनी में करीब 13 साल तक काम किया. इस दौरान उन्होंने विजुअल स्टोरीटेलिंग को करीब से समझा, जो आगे चलकर उनके फिल्मी करियर में बहुत काम आई.
एक फिल्म जिसने बदल दी सोच
लंदन यात्रा के दौरान सत्यजीत रे ने 'बाइसाइकिल थीफ' देखी. इस फिल्म ने उनके सोचने का तरीका पूरी तरह बदल दिया. उन्होंने तय किया कि वे ऐसी फिल्में बनाएंगे जो जिंदगी की सच्चाई दिखाएं. इसके बाद उन्होंने पाथेर पांचाली के अधिकार खरीदे और इसे फिल्म में बदलने का फैसला किया.
फिल्म की शूटिंग 27 अक्टूबर 1952 को शुरू हुई. पहला सीन रविवार के दिन शूट किया गया था. यह वही सीन था जिसमें बच्चे खेतों में दौड़ते हुए ट्रेन देखने जाते हैं. लेकिन पैसों की कमी बार बार सामने आती रही. कई बार शूटिंग बीच में ही रोकनी पड़ी. कलाकारों का चयन भी आसान नहीं था. अपू के किरदार के लिए उन्होंने अखबार में विज्ञापन दिया और काफी मेहनत के बाद सही चेहरा मिला.