नेपाल में बढ़ती चीन की ताकत पर अमेरिका का पलटवार, आर्मी को 6 हेलीकॉप्टर का ऑफर-काठमांडू में तेज हुई ताकत की जंग
नेपाल में बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच अमेरिका ने बड़ा दांव चला है. नेपाली सेना को 6 हेलीकॉप्टर देने का प्रस्ताव सामने आया है. इसे चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश माना जा रहा है. काठमांडू में इसको लेकर हलचल तेज है और सभी की नजर नेपाल के फैसले पर टिकी है.
नेपाल इन दिनों बड़े देशों की रणनीति का केंद्र बनता जा रहा है और अमेरिका अब यहां अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए नए तरीके अपना रहा है. इसी कड़ी में नेपाली आर्मी को छह हेलीकॉप्टर देने का प्रस्ताव सामने आया है जो सिर्फ रक्षा सहयोग नहीं बल्कि कूटनीतिक चाल भी माना जा रहा है. इस कदम के जरिए अमेरिका नेपाल की सरकार और सेना दोनों के साथ रिश्ते मजबूत करना चाहता है.
क्या है अमेरिका का पूरा ऑफर?
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका अपनी फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग योजना के तहत करीब 100 मिलियन डॉलर का ग्रांट देकर नेपाल को छह हेलीकॉप्टर देने को तैयार है. यह प्रस्ताव काठमांडू भेजा जा चुका है, जिस पर दोनों देशों के अधिकारियों और नेपाली सेना के बीच बातचीत चल रही है. अभी तक नेपाल की तरफ से कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है और मामला अभी विचार के दौर में है.
क्या दुविधा में है नेपाली सेना है?
नेपाली आर्मी इस प्रस्ताव को लेकर जल्दबाजी में फैसला नहीं लेना चाहती और इसके पीछे कई वजहें हैं क्योंकि हेलीकॉप्टर मिलने के बाद उनका संचालन आसान नहीं होता. इसके लिए ईंधन, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस पर भारी खर्च आता है. यही कारण है कि सेना के अंदर इस मुद्दे पर लगातार चर्चा चल रही है. इस कारण हर पहलू को ध्यान से परखा जा रहा है.
क्या अमेरिका बना रहा दबाव?
सूत्रों के मुताबिक काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास इस प्रस्ताव पर जल्दी निर्णय लेने के लिए लगातार दबाव बना रहा है और चाहता है कि नेपाल जल्द हरी झंडी दे. लेकिन दूसरी तरफ नेपाली सेना सावधानी के साथ आगे बढ़ रही है. वह बिना पूरी तैयारी के कोई फैसला लेने से बच रही है, ताकि भविष्य में किसी तरह की परेशानी न हो.
क्या पहले भी हुआ है सहयोग?
अमेरिका और नेपाल के बीच रक्षा सहयोग पहले से ही रहा है और इसके तहत दो हेलीकॉप्टर देने का समझौता पहले ही हो चुका है जो अगले साल तक नेपाल पहुंच सकते हैं. इसके अलावा अमेरिका पहले ही नेपाली सेना को दो M-28 एयरक्राफ्ट सौंप चुका है. इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं.
क्या चीन को रोकना है मकसद?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का असली मकसद नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को सीमित करना है क्योंकि नेपाल भारत और चीन के बीच एक अहम भौगोलिक स्थिति में है. अमेरिका नहीं चाहता कि इस क्षेत्र में चीन का दबदबा बढ़े. इसी वजह से वह नेपाल को आर्थिक और सैन्य मदद के जरिए अपने करीब लाने की कोशिश कर रहा है.
क्या बदलेगा दक्षिण एशिया का संतुलन?
अगर नेपाल इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है. अमेरिका की मौजूदगी यहां और मजबूत हो सकती है, जबकि चीन की रणनीति को चुनौती मिलेगी. फिलहाल सबकी नजर नेपाल के फैसले पर टिकी हुई है जो आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है.