नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच कागज पर भले ही युद्ध खत्म होने की दिशा में बढ़ रहा हो, लेकिन स्थिति सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है. इजरायल और अमेरिका द्वारा शुरू किए गए इस युद्ध के दौरान पूरी दुनिया प्रभावित रही. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से वैश्विक तेल सप्लाई चेन प्रभावित रही.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सामान्य स्थिति में लाने के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. अमेरिका के साथ चल रहे युद्ध के दौरान ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास समुद्री माइंस बिछा दिए थे, ताकि कोई भी देश पार न कर सके. अब इन माइंस को हटाने में लंबा समय लग सकता है.
पश्चिमी समुद्री सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए अमेरिका-ईरान समझौते के बाद सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन और पारंपरिक जहाजों की मदद से माइन-हंटिंग और स्वीपिंग प्रक्रिया चलाई जाएगी, जिसमें लगभग 40 से 50 दिन लग सकते हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पांच पश्चिमी समुद्री सुरक्षा स्रोतों ने यह आकलन किया है कि इस पूरी प्रक्रिया में एक महीने से अधिक का समय लग सकता है. इस दौरान अंडरवाटर ड्रोन की मदद से ऑपरेशन चलाए जाएंगे.
माइन-हंटिंग और स्वीपिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कोई भी जहाज वहां से सुरक्षित रूप से गुजर सकता है. अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के ऐलान के बाद शिपिंग अधिकारियों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है. हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते पर अभी भी हस्ताक्षर नहीं हुए हैं. दोनों देश 19 जून को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करेंगे और उसके बाद दो महीने तक विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेंगे, जिसके बाद इस डील को फाइनल माना जाएगा.
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दिया गया है. उन्होंने कहा कि वहां हमेशा के लिए कोई टोल नहीं लगेगा, यह हमेशा टोल-फ्री रहेगा. हालांकि हालिया बयानों से ईरान का इरादा बदला-बदला नजर आ रहा है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने 15 जून को कहा कि हम ट्रांजिट टोल यानी आवाजाही का शुल्क नहीं लगाना चाहते हैं, हालांकि दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क लिया जाएगा.
हालांकि ईरान की ओर से यह साफ नहीं किया गया कि वह शुल्क के बदले कौन सी सेवाएं देने वाला है. पहली रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान पर्यावरण शुल्क लगा सकता है. इसका मतलब यह है कि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इस रास्ते से गुजरता है और उन जहाजों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है. बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने से पहले तक किसी भी तरह का कोई शुल्क नहीं था. लेकिन अब ईरान का इरादा बदला-बदला नजर आ रहा है.